Showing posts with label History. Show all posts
Showing posts with label History. Show all posts

Sunday, May 29, 2022

नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव और प्रासंगिकता पर दावे

दीपंकर बताते हैं कि  हमारा विरोध भी हमारी क्षमता को ही दर्शाता है 

महान नक्सलबाड़ी उभार की 55वीं वर्षगांठ नामक उनका आलेख 25 मई 2022 को उनकी पार्टी वेबसाईट पर प्रकाशित हुआ है। यह आलेख बहुत ही गहनता से काफी कुछ बताता है। पार्टी के उत्थान, दमन और पुनरुत्थान पर बहुत ही सरलता और सादगी से बात करता है। ज़ेह आलेख हमें उपलब्ध करवाया पार्टी  की पंजाब इकाई के राज्य समिति सदस्य कामरेड हरभगवान भीखी ने जो काफी समय से पंजाब और अन्य राज्यों में भी सक्रिय हैं।  पर आपके विचारों की इंतज़ार हमें रहेगी। --सम्पादक 


महान नक्सलबाड़ी उभार की 55वीं वर्षगांठ
 

आधुनिक भारतीय इतिहास बहुत सारे लोकप्रिय जनउभारों का साक्षी रहा है। भारतीय स्वतंत्रता के लंबे संघर्ष को उत्पीड़ित भारतीयों के विभिन्न तबकों के उभारों ने ऊर्जा प्रदान की। वे उत्पीड़ित जो सिर्फ बाहरी औपनिवेशिक सत्ता से ही उत्पीड़ित नहीं थे बल्कि उस सामाजिक ढांचे से भी उत्पीड़ित थे जो भारतीयों पर भीतर से हावी था, जैसे जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, सामंती शक्ति, स्थानीय रजवाड़े और राजशाही।  

यह चाहे पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857-59) की बात हो या फिर गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन जैसी व्यापक जनजागरूकता हो या फिर 1940 के दशक में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले तेभागा और तेलंगाना जैसे किसान उभार हों, उन आदिवासी लोगों और गरीब किसानों, जिनका खून जमींदार, साहूकार और औपनिवेशिक शासक चूसते थे, के विद्रोह जनप्रतिरोध के मुख्य घटक थे।

वास्तविक समानता, स्वतंत्रता और न्याय हासिल करने के सपने को मुकम्मल करने की जद्दोजहद के साथ ये जन उभार 1947 के बाद भी जारी रहे। भूमिहीन किसानों और उत्पीड़ित चाय बागान मजदूरों का 25 मई 1967 का नक्सलबाड़ी उभार, ऐसा ही ऐतिहासिक क्षण है। इसने देश भर में उत्पीड़ितों और युवाओं को तरंगित कर दिया।  

राज्य ने इसे कुचलने के लिए प्राणपण से युद्ध छेड़ दिया। आज के दौर में औपनिवेशिक कालीन उत्पीड़न वाले काले क़ानूनों, हिरासत में हिंसा और न्यायेतर आतंक का अंधाधुंध इस्तेमाल हम देखते हैं, उसको पहला बड़ा बल राज्य दमन की प्रयोगशाला में 1970 के दशक में मिला. परंतु नक्सलबाड़ी की विरासत अपने उभार के 55 वर्षों में हर बीतते दिन के साथ बढ़ती रही, गहराती गयी और इसका विस्तार होता रहा है।  

इस उभार ने 22 अप्रैल 1969 को भाकपा(माले) के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। अलबत्ता इस नवगठित पार्टी को न्यायेतर हिंसा और नरसंहारों समेत भारतीय राज्य के भारी दमन और क्रोध का सामना करना पड़ा जिसमें सुहार्तो के शासनकाल में इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों के कत्लेआम की छाप दिखती थी। लेकिन पार्टी इस तूफान में भी कामयाबी के साथ डटी रही। इसने भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को व्यापक तौर पर ऊर्जा प्रदान की और उसका क्रांतिकारीकरण किया। मोदी काल में असहमति के व्यापक स्वरों को निशाना बनाने के लिए गढ़े गए शब्द “अर्बन नक्सल” का अविवेकी प्रयोग नक्सलबाड़ी की शक्ति और प्रतिरोध क्षमता को दर्शाता है। 

नक्सलबाड़ी के लोकप्रिय मिथक के विपरीत यह कुछ अलग-थलग क्रांतिकारियों की चीनी क्रांति को भारतीय जमीन पर रोपने की अराजकतापूर्ण और दुस्साहसिक कार्यवाही नहीं थी। अगर ऐसा होता तो वह एक अल्पजीवी बुलबुला सिद्ध होता। वह एक जन आलोड़न था, जिसकी गहरी जड़ें, अन्याय और दमन के खिलाफ होने वाले विद्रोहों की भारतीय परंपरा में थी. उसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी और ऊर्जा थी, वह क्रांतिकारी संभावना और परंपरा को महसूस करने की एक साहसपूर्ण कार्यवाही थी।  

कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के भीतर यह तेभागा और तेलंगाना की भावना को पुनर्जीवित करने का सुदृढ़ प्रयास था। आजादी के बाद जनता के मोहभंग और राजनीतिक संक्रमण (1967 के चुनावों में कॉंग्रेस नौ राज्यों में चुनाव हार गयी थी) को एक सुदृढ़ क्रांतिकारी धार देने की कोशिश थी।  

कॉमरेड चारु मजूमदार तेभागा आंदोलन के एक समर्पित संगठक थे और अपने कॉमरेडों की टीम और तराई डूआर्स और दार्जिलिंग व उत्तरी बंगाल के संघर्षशील लोगों के साथ तेभागा के समय के पूरे अनुभव और विकसित अंतर्दृष्टि का उपयोग उन्होंने नक्सलबाड़ी के उभार को विकसित करने में लगाया। भाकपा(माले) की स्थापना और तेज़ गति से फैलाव ने क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन की गहरी जड़ों, उसके प्रति जनता का आकर्षण और शक्ति को प्रदर्शित किया और जिस तरह से 1970 के घोषित आपातकाल से लेकर फासीवादी हमले के वर्तमान शासन तक यह आंदोलन अपनी जमीन को मजबूती से पकड़े रखने और अपने क्षितिज को विस्तारित करने में कामयाब रहा, वह इसकी अंतर्निहित शक्ति और जीवंतता को प्रदर्शित करता है। 

नक्सलबाड़ी की 55वीं वर्षगांठ पर आंदोलन के शहीदों, इस महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं तथा उन सभी कवियों, गायकों और संघर्षों के इलाकों की जनता के प्रति—जिन्होंने इसके संदेश को पूरे भारत में फैलाया तथा जबर्दस्त दमन झेलते हुए साहस, ऊर्जा और प्यार के सा​थ आंदोलन को कायम रखा—हम अपना सम्मान प्रकट करते हैं। नक्सलबाड़ी, उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ जनप्रतिरोध की अपराजेय भावना का प्रतीक बन गया है। यह सत्ता के मद में चूर शासकों की हेकड़ी और आक्रामकता के विरुद्ध संघर्षशील जनगण की विजयी मुस्कान है. नक्सलबाड़ी को लाल सलाम!  

-दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव भाकपा (माले)

Thursday, November 25, 2021

बटुकेश्वर दत्त और सावरकर का नाम एक साथ नहीं होगा

भाजपा और संघ के खिलाफ भाकपा माले खुल कर आई मैदान में 


पटना: 25 नवंबर 2021: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन डेस्क)::

इतिहास में मिलावट अक्सर होती रही है। इसे चुपचाप देखने वालों की संख्या भी काफी रही है। जो बोले वो भी कोई ज़्यादा नहीं थे। इस बार इतिहास को सुरक्षित बचाए रखने के लिए जो लोग आगे आए हैं उनमें भाकपा (माले) लिबरेशन भी अग्रणी पंक्ति  में शामिल है। पार्टी ने कहा है कि बटुकेश्वर दत्त और सावरकर का नाम एक साथ नहीं लिया जा सकता। हम इसका विरोध करते हैं और करते रहेंगे। इस मकसद के लिए बटुकेश्वर दत्त की बेटी भारती बागची भी पार्टी के साथ आई है। भारतीय जनता पार्टी ने आजादी के 75 साल पूरा होने पर अमृत महोत्सव मनाने का जो सिलसिला शुरू किया है उसका विरोध करने के लिए आगे आई है भाकपा माले। भाकपा माले का कहना है की भाजपा और आर एस एस इतिहास को बदलने की कुचेष्टाएं कर रहे हैं। आज़ादी के अमृत महोत्स्व की हकीकत यह है  की कंगना रनौत सरेआम आज़ाद का मज़ाक उड़ा रही है।  भाकपा माले का स्पष्ट शब्दों में मानना है कि भाजपा भारत के इतिहास को बदल देना चाहती है लेकिन हम ज़ह सब नहीं होने देंगें।  अभिनेत्री कंगना रनोट के बयान को भाजपा की उसी सोच से जोड़ कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि 1947 में भारत को भीख मिली थी और असली आजादी 2014 में मिली। इस ब्यान से असलियत को देखना मुश्किल नहीं रह जाता। 

भाकपा (माले) ने तय किया है कि वह दो साल तक जन अभियान चलाएगी और आजादी का सच लोगों को बताएगी। 

बटुकेश्वर दत्त के जन्म दिन पर भाकपा (माले) द्वारा 'आजादी के 75 साल-जनअभियान' की शुरूआत भी की गई है। 

शहीद भगत सिंह के क्रन्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के जन्म दिन पर आजादी के 75 साल: जनअभियान की शुरूआत। वही बी के दत्त जिन्होंने आज़ादी के बाद भी केवल देश के लिए सोचा। 

इस जन अभियान के संबंध में बनाए कार्यक्रम के मुताबिक पार्टी ने बताया कि प्रख्यात इतिहासकार प्रो. ओपी जायसवाल की अध्यक्षता में चलेगा जनअभियान। 

पार्टी ने सख्त स्टैंड लेते हुए अपना संकल्प दोहराया कि खून-पसीने से निर्मित आजादी के आंदोलन के इतिहास को हड़पने व विकृत नहीं करने देंगे।  इस आशय की बात दीपंकर भट्टाचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कही। 

भगत सिंह के साथी महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के जन्म दिन पर आज पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर में  इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों व नागरिक समुदाय के आह्वान पर दो सालों तक चलने वाले आजादी के 75 साल: जन अभियान की शुरूआत हुई. इसके पूर्व आज सुबह में जक्कनपुर स्थित बटुकेश्वर दत्त लेन में एक सभा भी आयोजित की गई और विधानसभा मुख्य द्वार पर स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। 

आजादी के 75 सालों का लेखाजोखा भी पार्टी ने संक्षेप में बताया। पार्टी ने कहा सपने और चुनौतियां विषय पर आयोजित जनकन्वेंशन में मुख्य रूप से प्रख्यात इतिहासकार प्रो. ओपी जायसवाल, माले के महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य, जाने-माने कवि अरूण कमल, पटना विवि के इतिहास विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. भारती एस. कुमार, एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट के प्रोफेसर विद्यार्थी विकास, पसमांदा महाज के नेता व पूर्व सांसद अली अनवर आदि वक्ताओं ने अपने विचार रखे. इस मौके पर एनआईटी के पूर्व शिक्षक प्रो. संतोष कुमार शिक्षाविद् गालिब, रंजीव, इंजीनियर पीएस महाराज, डाॅ. पीएनपीपाल, इप्टा के तनवीर अख्तर, माले के राज्य सचिव कुणाल, धीरेन्द्र झा, महबूब आलम, संतोष सहर, मीना तिवारी, संदीप सौरभ सहित कई लोग उपस्थित थे. मंच का संचालन कुमार परवेज ने किया. हिरावल के साथियों के अजीमुल्ला खां रचित ‘हम हैं इसके मालिक हिंदोस्ता हमारा’ गायन से जनकन्वेंशन की शुरूआत हुई। 

इस आयोजन की चर्चा करते हुए कहा,"आज महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्म दिवस है।  इस पावन अवसर पर मेरी, उनकी इकलौती बेटी, की ओर से आप सभी को, जो बटुकेश्वर दत्त और शहीद—ए—आजम भगत सिंह की धर्मनिरपेक्षता एवं गरीबों के उत्थान की सच्ची भावना से प्रेरित भाईचारा व बराबरी की विचारधारा पर चलने की प्रेरणा लेते हैं, को शुभकामनायें देती हूं। 

इंकलाब जिन्दाबाद! 

शारीरिक अक्षमता के कारण मैं यह संदेश 'वायस मैसेज' से देने में असमर्थ हूं जिसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं।  

मेरे पिता क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के जन्मदिवस पर हो रहे आयोजन की सफलता की कामना करती हूं। 

बटुकेश्वर दत्त की बेटी भारती बागची का संदेश

इस मौके पर ओपी जायसवाल ने कहा कि भाजपा व संघ का आजादी के आंदोलन में विश्वासघात का इतिहास रहा है. वे संविधान के भी विरोधी हैं, क्योंकि यह धारा मानती है कि मनुस्मृति ही संविधान है. जब संविधान लागू हो रहा था और सबको वोट का अधिकार मिल रहा था, तब संघ के नेताओं ने उसका विरोध किया था. ये लोग आज इतिहास को विकृत कर रहे हैं. इसके खिलाफ एक व्यापक एकता बनाना और आजादी के 75 साल की मूल भावना को याद करना व उस संघर्ष को आगे बढ़ाना हम सबका दायित्व बनता है। 

कन्वेंशन में माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि बटुकेश्वर दत्त व सावरकर का नाम एक साथ नहीं लिया जा सकता. अंडमान की जेल में सावरकर का इतिहास माफी मांगने का है, जबकि बटुकेश्वर दत्त अनवरत जेल में लड़ते रहे. यह लड़ाई भाजपा के हर झूठ व इतिहास को लेकर उनके खेल के खिलाफ है. आजादी के आंदोलन के इतिहास से ऊर्जा लेकर हम आज की लड़ाई लड़ रहे हैं. हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन, 1942 की क्रांति, देश में चले किसान आंदोलन, आजादी आंदोलन में मुस्लिमों की भागीदारी, दलितों-पिछड़ों, महिलाओं की भागीदारी आदि पहलूओं को हम याद कर रहे हैं। 

हमारे पूर्वजों ने लड़कर के अंग्रेजों को भगाया. उनके खून-पसीने से आजादी के आंदोलन के इतिहास का निर्माण हुआ है. यदि अगर संघर्ष नहीं हुआ होता तो इतिहास नहीं बनता. यह हमारी विरासत है, इसका रखरखाव, सबक लेना, कोई गलती हुई तो नहीं दुहराना, यह हम सबको करना है. इस इतिहास को हम संभालेंगे. भाजपा व संघ सत्ता के बल पर उस इतिहास को तोड़-मरोड़ देना चाहते हैं. इसलिए हमें आजादी के मूल्यों को बचाना भी है और ऐसी ताकतों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष में भी उतरना है। 

अरूण कमल ने कहा कि भगत सिंह व उनके साथियों का संघर्ष,  नौसैनिक विद्रोह आदि हमारे आजादी के आंदोलन के मूल्यवान पहलू हैं .आज उस आाजदी को बचाने और उन्हें याद करने की जरूरत है. आजादी की लड़ाई कभी खत्म नहीं होगी. वह सांस की तरह है. हम सब मिकर चलेंगे और एक नया समाज बनायेंगे। 

विद्यार्थी विकास ने गांधी की जिंदगी बचाने वाले बत्तख मियां के कार्यों पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कहा कि भाजपा-संघ के लोग गांधी को मारने वाले गोडसे की भक्ति करते हैं, हमारी विरासत बत्तख मियां की विरासत है, जिन्होंने गांधी को बचाया था. भारती एस कुमार ने कहा कि यह जनअभियान सच्चे इतिहास को लोगों के बीच ले जाने व समझने का एक बेहतर प्रयास है. मौजूदा सरकार उसे तोड़-मरोड़ रही है. इतिहास को तथ्यों पर आधारित होना चाहिए और इसके लिए हमें लड़ना होगा। 

अली अनवर ने आजादी के आंदोलन में हाशिये पर पड़े लोगों के इतिहास को सामने लाने के लिए अभियान की सराहना की. कहा कि संघ के लोग देश की जनता को जहर पिलाने का काम कर रहे हैं. प्रज्ञा सिंह ठाकुर व कंगना रनौत जैसे लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिनके लिए आजादी एक भीख है. यह तमाम शहीदों का अपमान है। 

अंत में जनकन्वेंशन से कुछेक प्रस्ताव लिए गए. प्रो. ओपी जायसवाल की अध्यक्षता में अगले दो सालों तक इस जन अभियान को संचालित करने का निर्णय लिया गया. साथ ही, पटना में बटुकेश्वर दत्त के सम्मान में पटना स्थित सचिवालय हाॅल्ट रेलवे स्टेशन, मीठापुर-गर्दनीबाग रोड और गर्दनीबाग स्थित अंग्रेजों के जमाने के गेट पब्लिक लाइब्रेरी का नाम बटुकेश्वर दत्त के नाम पर किए जाने की मांग की गई. जनभागीदारी से गोरिया मठ के पास बटुकेश्वर दत्त द्वार का निर्माण करने का भी संकल्प लिया गया। 

प्रस्ताव में 1857, 1942, किसान आंदोलन, आदिवासी आंदोलन आदि के अनछुए पहलूओं का दस्तावेजीकरण का निर्णय किया गया और जिलों में कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय किया गया. कन्वेंशन ने अभिनेत्री कंगना रनौत से अविलंब पद्म श्री का पुरस्कार वापस लेने की भी मांग की। इस तरह बहुत सी यधारी बातों के बाद कार्यक्रम संपन्न हुआ।