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Monday, September 29, 2025

‘भारत मंथन-2025: नक्सल मुक्त भारत पर हुई विस्तृत चर्चा

गृह मंत्रालय//HM Amit Shah//Regarding Naxal Movement//28th September 2025 at 8:32 PM by PIB Delhi 
पीएम मोदी के नेतृत्व में लाल आतंक का खात्मा दृढ़ता से दोहराया 
नई दिल्ली: 28 सितंबर 2025: (PIB Delhi//नक्सलबाड़ी स्क्रीन डेस्क)::
*केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में ‘भारत मंथन-2025: नक्सल मुक्त भारत, पीएम मोदी के नेतृत्व में लाल आतंक का खात्मा’ के समापन सत्र को संबोधित किया

*1960 के दशक से अब तक, वामपंथी हिंसा में जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिन्होंने अपनों को खोया, शारीरिक व मानसिक विपदाएं झेलीं है, उन सभी को नमन करता हूँ

*जो लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद विकास न पहुँच पाने के कारण फैला, वे देश को गुमराह कर रहे हैं

*जिनके हाथ में हथियार हैं, उन्हें आदिवासियों की चिंता नहीं है, बल्कि दुनियाभर से रिजेक्ट हो चुके वामपंथी विचार को जिंदा रखने की चिंता है

*नक्सल प्रभावित इलाकों तक विकास न पहुंचने के पीछे का एक मात्र कारण नक्सलवाद है


*जब तक नक्सलवाद को वैचारिक पोषण, लीगल समर्थन और वित्तीय पोषण करने वाले लोगों को एक्सपोज नहीं किया जाएगा, तब तक नक्सलवाद की समस्या समाप्त नहीं होगी

*एक जमाने में पशुपतिनाथ से तिरुपति तक फैले रेड कॉरिडोर का नारा लगाया जाता था, तो चिंता होती थी, मगर आज कोई इसका जिक्र करता है तो लोग हँसते हैं

*जब तक वामपंथी दल पश्चिम बंगाल में सत्ता में नहीं आये तब तक वहाँ नक्सलवाद पनपा और जैसे ही वे सत्ता में आए, नक्सलवाद वहाँ से गायब हो गया

*हथियार छोड़ने वालों के लिए रेड-कार्पेट है, लेकिन निर्दोष आदिवासियों को नक्सली हिंसा से बचाना सरकार का धर्म है

*आत्मसमर्पण के बढ़ते आँकड़ें बताते हैं कि नक्सलियों के पास समय कम बचा है

*बड़े-बड़े लेख लिखकर सरकार को उपदेश देने वाले बुद्धिजीवी विक्टिम ट्राइबल के लिए लेख क्यों नहीं लिखते? उनकी संवेदना सिलेक्टिव क्यों है?

*मोदी सरकार सरेंडर की नीति को बढ़ावा देती है, मगर गोली का जवाब गोली से दिया जायेगा

*ऑपरेशन ब्लैक फारेस्ट के दौरान वामपंथी राजनीतिक दल अभियान को रुकवाने के लिए पत्र लिखकर गुहार लगाने लगे, जिससे उनका असली चेहरा सामने आ गया

*जब तक छत्तीसगढ़ में विपक्षी पार्टी की सरकार थी, संयुक्त अभियानों में अधिक सहयोग नहीं मिलता था, 2024 में हमारी पार्टी की सरकार बनने के एक साल में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में ‘भारत मंथन-2025: नक्सल मुक्त भारत, पीएम मोदी के नेतृत्व में लाल आतंक का खात्मा’ के समापन सत्र को संबोधित किया।

इस अवसर पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि 31 मार्च, 2026 तक भारत नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जब तक भारतीय समाज नक्सलवाद का वैचारिक पोषण, कानून समर्थन और वित्तीय पोषण करने वाले लोगों को समझ नही लेता तब तक नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई समाप्त नहीं होगी। 

उन्होंने कहा कि आंतरिक सुरक्षा और देश की सीमाओं की सुरक्षा हमेशा से हमारी विचारधारा का प्रमुख अंग रही है। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी के मूल उद्देश्यों में तीन चीज़ें बहुत प्रमुख थीं- देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के सभी अंगों का पुनरूत्थान। केन्द्रीय गृह मंत्री ने 1960 के दशक से अब तक, वामपंथी हिंसा में जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिन्होंने अपनों को खोया, शारीरिक व मानसिक विपदाएं झेलीं है उन सभी लोगों को नमन किया। उन्होंने कहा कि जब तक वामपंथी दल पश्चिम बंगाल में सत्ता में नहीं आये तब तक वहाँ नक्सलवाद पनपा और जैसे ही वे सत्ता में आए, नक्सलवाद वहाँ से गायब हो गया।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने सत्ता संभाली तब देश की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से तीन महत्वपूर्ण हॉटस्पॉट- जम्मू कश्मीर, नॉर्थईस्ट और वामपंथी कॉरिडोर, ने देश की आंतरिक सुरक्षा को छिन्न-भिन्न करके रखा था। उन्होंने कहा कि लगभग 4-5 दशकों से हज़ारों लोग इन तीनों जगहों पर पनपी औऱ फैली अशांति के कारण जान गंवा चुके थे, संपत्ति का बहुत नुकसान हुआ था, देश के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा गरीबों के विकास की जगह इन हॉटस्पॉट को संभालने में जाता था और सुरक्षा बलों की भी अपार जानहानि हुई थी। उन्होंने कहा कि श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही इन तीनों हॉटस्पॉट पर ध्यान केन्द्रित किया गया और स्पष्ट दीर्घकालीन रणनीति के आधार पर काम हुआ। New 

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। उन्होंने कहा कि लगभग 70 के दशक की शुरूआत में नक्सलवाद और हथियारी विद्रोह की शुरूआत हुई। 1971 में स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा 3620 हिंसक घटनाएं हुईं और इसके बाद 80 के दशक में पीपल्स वॉर ग्रुप ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड बिहार और केरल तक इसका विस्तार किया। उन्होंने कहा कि 80 के दशक के बाद वामपंथी गुटों ने एक दूसरे में विलय की शुरूआत की और 2004 में प्रमुख सीपीआई (माओवादी) गुट का गठन हुआ और नक्सली हिंसा ने बहुत गंभीर स्वरूप ले लिया। उन्होंने कहा कि पशुपति से तिरुपति कॉरिडोर को रेड कॉरिडोर के रूप में जाना जाता था।

श्री अमित शाह ने कहा कि देश के भूभाग का 17 प्रतिशत हिस्सा रेड कॉरिडोर में समाहित था और इस समस्या से 12 करोड़ की आबादी प्रभावित थी। उस वक्त की आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवाद का दंश झेलकर अपना जीवन बिता रहा था। श्री शाह ने कहा उसकी तुलना में दो अन्य हॉटस्पॉट–कश्मीर में 1 प्रतिशत भूभाग आतंकवाद औऱ पूर्वोत्तर में देश का 3.3. प्रतिशत भूभाग अशांति से ग्रस्त था। उन्होंने कहा कि जब 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री बने तब मोदी सरकार ने संवाद, सुरक्षा और समन्वय के तीनों पहलुओं पर काम करने की शुरूआत की। इसके परिणामस्वरूप  31 मार्च, 2026 को इस देश से हथियारी नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जहां पहले scattered approach से काम होता था, घटना-आधारित रिस्पॉंस होता था और कोई स्थायी नीति नहीं थी। एक प्रकार से कहें तो सरकार के रिस्पॉंस का स्टीयरिंग नक्सलियों के हाथों में था। श्री शाह ने कहा कि 2014 के बाद सरकार के अभियानों, कार्यक्रमों का स्टीयरिंग भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पास है औऱ यह एक बहुत बड़ा नीतिगत परिवर्तन है। उन्होंने कहा कि scattered approach की जगह unified और ruthless approach को अपनाने का काम मोदी सरकार ने किया है।

उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की नीति है जो हथियार छोड़कर सरेंडर करना चाहते हैं, उनके लिए रेड कार्पेट है और उनका स्वागत है, लेकिन अगर हथियार लेकर निर्दोष आदिवासियों को मारना चाहते हैं तो सरकार का धर्म निर्दोष आदिवासियों बचाना और हथियारबंद नक्सलियों का सामना करना है।

श्री अमित शाह ने कहा कि पहली बार भारत सरकार ने बिना किसी कन्फ्यूज़न के एक स्पष्ट नीति अपनाई। उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों को हमने छूट दी और इंटेलीजेंस, इन्फॉर्मेशन शेयरिंग तथा ऑपरेशन में कोऑर्डिनेशन के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों के बीच एक व्यावहारिक सेतु बनाया गया। उन्होंने कहा कि आर्म्स और अम्युनिशन की सप्लाई पर नकेल कसी गई। 2019 के बाद हमें उनकी सप्लाई को लगभग 90 प्रतिशत से अधिक रोकेने में सफलता प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों का वित्तपोषण करने वालों पर एनआईए और ईडी ने नकेल कसी है, साथ ही हम नक्सलवादियों के अर्बन नक्सल सपोर्ट, लीगल सहायता औऱ मीडिया नरेटिव गढ़ने से भी लड़े हैं। उन्होंने कहा कि हमने सेंट्रल कमिटी के मेंबर्स पर लक्षित तरीके से कार्रवाई की और 18 से अधिक सेंट्रल कमिटी के मेंबर 19 अगस्त से आज तक न्यूट्रलाइज़ किए जा चुके हैं। गृह मंत्री ने कहा कि सुरक्षा वैक्यूम भरने का काम भी किया गया है और ऑपरेशन ऑक्टोपस और ऑपरेशन डबल बुल जैसे टारगेटेड ऑपरेशन किए गए हैं। उन्होंने कहा कि डीआरजी, एसटीएफ, सीआरपीएफ और कोबरा की संयुक्त ट्रेनिंग की भी शुरूआत की। चारों अब मिलकर अभियान चलाते हैं और उसका चेन ऑफ कमांड भी अब स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि एकीकृत प्रशिक्षण से हमारी सफलता में बहुत अंतर आया है। इसके साथ-साथ फॉरेंसिक जांच शुरू की गई, लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम उपलब्ध कराया गया, मोबाइल फोन की गतिविधियों को राज्य पुलिस को उपलब्ध कराया गया, साइंटिफिक कॉल लॉग्स एनालिसिस के सॉफ्टवेयर बने औऱ सोशल मीडिया एनालिसिस से भी उनके छुपे हुए सपोर्टर्स को ढूंढने का काम हुआ। इससे नक्सल विरोधी अभियान में न सिर्फ तेज़ी आई बल्कि वे सफल औऱ परिणामलक्षी भी हुए।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि 2019 के बाद हमने राज्यों के क्षमता निर्माण पर भी बल दिया। SRE और SIS योजना के तहत लगभग 3331 करोड़ रूपए जारी किए गए, जो लगभग 55 प्रतिशत की वद्धि दर्शाता है। इसके माध्यम से फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बढ़ाए गए और इस पर लगभग 1741 करोड़ रूपए खर्च हुए। उन्होंने कहा कि पिछले 6 साल में 336 नए सीएपीएफ के कैंप बनाकर सुरक्षा के वैक्यूम को भरने का काम मोदी सरकार ने किया। इसके परिणामस्वरूप 2004 -14 के मुकाबले 2014-24 में सुरक्षाबलों की मृत्यु में 73 प्रतिशत की कमी आई औऱ नागरिकों की मृत्यु में 74 प्रतिशत कमी आई। श्री शाह ने कहा कि पहले हमें छत्तीसगढ़ में सफलता नहीं मिलती थी क्योंकि वहाँ विपक्ष की सरकार थी। 2024 में हमारी सरकार बनी और 2024 में किसी एक साल के में सबसे अधिक 290 नक्सलियों को न्यूट्रलाइज़ करने का काम किया गया।

गृह मंत्री ने कहा कि हम किसी को नहीं मारना चाहते। उन्होंने कहा कि  290 न्यूट्रलाइज़्ड नक्सलियों के मुकाबले 1090 गिरफ्तार किए और 881 ने सरेंडर किया। उन्होंने कहा कि यह बताता है कि सरकार की  अप्रोच क्या है। हम पूरा प्रयास करते हैं कि नक्सली को सरेंडर या अरेस्ट करने का पूरा मौका दिया जाता है। लेकिन जब नक्सलवादी हाथ में हथियार लेकर भारत के निर्दोष नागरिकों को मारने निकलते हैं तो सुरक्षाबलों के पास कोई और चारा नहीं होता और उन्हें गोली का जवाब गोली से ही देना होता है। श्री शाह ने कहा कि 2025 में अब तक 270 नक्सलियों को न्यूट्रलाइज़ किया गया है, 680 गिरफ्तार किए गए हैं और 1225 ने आत्मसमर्पण किया है। दोनों वर्षों में आत्मसमर्पण और अरेस्ट की संख्या न्यूट्रलाइज़्ड की संख्या से अधिक है। आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या बताती है कि नक्सलियों का समय अब बहुत कम बचा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों ने तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर Karregutaa hiils पर बहुत बड़ा कैंप बनाया था जहां बहुत सारे हथियार थे, दो साल का राशन था, हथियार और आईईडी बनाने की फैक्ट्रियां थी और वहां पहुंचना बहुत मुश्किल था। उन्होंने कहा कि 23 मई 2025 को उनके इस कैंप को ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में नष्ट कर दिया गया औऱ 27 हार्डकोर नक्सली मारे गए। साथ ही बीजापुर में 24 हार्डकोर नक्सली मारे गए हैं। गृह मंत्री ने कहा कि इस ऑपरेशन के माध्यम से छत्तीसगढ़ में बचेखुचे नक्सलियों की रीढ़ टूट गई है। श्री शाह ने कहा कि वर्ष 2024 में जो नक्सली न्यूट्रलाइज़्ड किए गए, उनमें 1 जोनल कमिटी मेंबर, 5 सबज़ोनल कमिटी मेंबर, 2 स्टेट कमिटी मेंबर, 31 डिविज़नल कमिटी मेंबर और 59 एरिया कमिटी मेंबर शामिल हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि 1960 से 2014 तक कुल 66 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन थे और मोदी सरकार के 10 साल में नए 576 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाने का काम हुआ। 2014 में 126 नक्सलाइट ज़िले थे, अब 18 नक्सलाइट ज़िले ही बचे हैं। मोस्ट अफेक्टेड ज़िले 36 से घटकर 6 बचे हैं। पुलिस स्टेशन लगभग 330 थे अब 151 रह गए हैं और इनमें भी 41 नए बनाए गए पुलिस स्टेशन हैं। पिछले 6 साल में 336 सुरक्षा कैंप बनाए गए और नाइट लैंडिंग के लिए 68 हैलीपैड बनाए गए हैं। हमारे सीआरपीएफ के जवानों के लिए हमने 76 नाइट लैंडिंग हैलीपैड बनाए हैं। उन्होंने कहा कि नक्सलियों की आय़ कम करने के लिए एनआईए, ईडी और राज्य सरकारों ने करोडों रूपए की संपत्तियां ज़ब्त की हैं। गृह मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार के समन्वय के लिए भी उनके स्तर पर मुख्यमंत्रियों के साथ 12 बैठकें हुई हैं और अकेले छत्तीसगढ़ में 8 बैठकें हुई हैं। छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों के आत्मसमर्पण के लिए ल्यूक्रेटिव पैकेज लाई है। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवादी क्षेत्र में विकास के लिए भी कई काम किए गए हैं। गृह मंत्री ने कहा कि दुनिया में जहां भी वामपंथी विचारधारा पनपी, वहां वामपंथी विचारधारा औऱ हिंसा का चोली दामन का रिश्ता रहा है औऱ यही नक्सलवाद की जड़ है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जो लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद का मूल कारण विकास है वे देश को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 60 करोड़ गरीबों के लिए प्रधानमंत्री मोदी जी अनेक योजनाएं लाए हैं, नक्सलवादी क्षेत्र में कौन इन योजनाओं को नहीं पहुंचने देता। उन्होंने कहा कि सुकमा या बीजापुर में स्कूल नहीं पहुंचा तो उसका दोषी कौन है। वामपंथी क्षेत्र में सड़कें क्यों नहीं बन सकीं क्योंकि नक्सलियों ने कॉट्रैक्टर्स की हत्या कर दी। उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े लेख लिखकर सरकार को उपदेश देने वाले बुद्धिजीवी विक्टिम ट्राइबल के लिए लेख क्यों नहीं लिखते? उनकी संवेदना सिलेक्टिव क्यों है? उन्होंने कहा कि न तो नक्सलियों के समर्थक आदिवासियों का विकास चाहते और न ही उनके मन में उनकी चिंता है, बल्कि उन्हें दुनियाभर में रिजेक्ट होती अपनी विचारधारा को ज़िदा रखने की चिंता है। श्री शाह ने  कहा कि विकास न पहुंचने का एकमात्र कारण वामपंथी विचारधारा है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलियों ने पहला निशाना संविधान और फिर न्यायिक व्यवस्था को बनाया। संवैधानिक वैक्यूम खड़ा किया और फिर स्टेट की कल्पना को निशाना बनाया और स्टेट का वैक्यूम खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जो भी उनके साथ नहीं जुड़े उन्हें स्टेट का इन्फॉर्मर बनाकर जनता की अदालत में फांसी की घोषणा कर दी।

इन्होंने पैरेलल सरकार बनाई। श्री शाह ने कहा कि देश के कल्याण के लिए अपनी विचारधारा से उपर उठने की ज़रूरत है।  उन्होंने कहा कि गवर्नेंस के वैक्यूम के कारण ही वहाँ  विकास, साक्षरता, स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच सकी हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन ब्लैक फारेस्ट के दौरान वामपंथी राजनीतिक दल अभियान को रुकवाने के लिए पत्र लिखकर गुहार लगाने लगे, जिससे उनका असली चेहरा सामने आ गया। उन्होंने कहा कि नक्सलियों के साथ कोई सीज़फायर नहीं होगा। अगर उन्हें सरेंडर करना है तो सीज़फायर करने की ज़रूरत ही नहीं है, उन्हें हथियार डाल देने चाहिए। पुलिस एक भी गोली नहीं चलाएगी और उन्हें रिस्टेब्लिश करेगी। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन ब्लैक फ़ॉरेस्ट होते ही नक्सलियों के समर्थकों की सारी छद्म सिम्पैथी एक्सपोज़ हो गई।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि 2014-2024 के दौरान वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों में 12 हज़ार किलोमीटर सड़कें बनी हैं, 17,500 सड़कों के लिए बजट स्वीकृत हुआ, 6300 करोड़ रूपए की लागत से 5000 मोबाइल टॉवर लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि 1060 बैंक शाखाएं खोली गई, 937 एटीएम लगाए गए, 37,850 बैंकिग कॉरेस्पॉडेंट्स बनाए गए, 5899 डाकघर खोले गए, 850 स्कूल और 186 अच्छे स्वास्थ्य केन्द खोले गए हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार नियद नेल्लानार योजना के तहत आयुष्मान भारत कार्ड, आधार कार्ड, वोटिंग कार्ड, स्कूल बनाना, राशन दुकान, आंगनवाड़ी स्वीकृत करने के काम में लगी है।

पूर्वोत्तर में उग्रवाद का जिक्र करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि पूर्वोत्तर में 2004-2014 की तुलना में  2014-2024 में सुरक्षाकर्मियों की मृत्यु में 70 प्रतिशत की कमी आई है। इसी प्रकार, 2004-14 की तुलना में 2014-24 में नागरिकों की मृत्यु में 85 प्रतिशत की कमी आई है। मोदी सरकार ने 12 महत्वपूर्ण शांति समझौते कर हाथ में हथियार लेकर घूमने वाले 10,500 युवाओं को सरेंडर कर मेनस्ट्रीम में लाने का काम किया। उन्होंने कहा कि एक ज़माने में पूरा पूर्वोत्तर अपने आप को देश से कटा हुआ महसूस करता था लेकिन आज आज पूर्वोत्तर ट्रेन, रेलवे, और विमान से जुड़ा हुआ है। श्री शाह ने कहा कि मोदी सरकार ने भौतिक दूरी के साथ ही दिल्ली औऱ नॉर्थईस्ट के बीच दिलों की दूरी भी कम करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि आज पूर्वोत्तर शांति और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि जम्मू कश्मीर में 2019 में प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में धारा 370 को समाप्त कर दिया गया। उसके बाद सरकार ने सुनियोजित तरीके से विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन से जनता का विश्वास अर्जित किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंक के सामने बहुत सुनियोजित नीति के तहत मोदी सरकार ने काम किया। श्री शाह ने कहा कि 2004-14 में 7300 हिंसक घटनाओं के मुकाबले 2014-24 में 1800 हिंसक घटनाए हुई हैं। सुरक्षाकर्मियों की मृत्यु में 65 प्रतिशत और नागरिकों की मृत्यु में 77 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि देश का हर कानून आज वहां अमल में है। जम्मू कश्मीर में आज़ादी के बाद पहली बार पंचायत चुनाव हुए और 99.8 प्रतिशत मतदान हुआ। श्री शाह ने कहा कि हम जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की समस्या को धीरे धीरे सुलझाने के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।

***//आरके / वीवी / आरआर / पीआर//(रिलीज़ आईडी: 2172501)

Sunday, September 8, 2024

31 मार्च 2026 तक देश नक्सलवाद से मुक्त होगा: अमित शाह

बस्तर क्षेत्र में 4,000 से अधिक कर्मियों की चार नई बटालियन तैनात

नई दिल्ली: 8 सितंबर 2024: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन डेस्क)::


केंद्र सरकार एक बार फिर नए जोश और नई रणनीति के तहत नक्सलवाद के पूर्ण उन्मूलन के लिए नया अभियान शुरू करने की तैयारी में है। इस नई नीति के अंतर्गत अब झारखंड से तीन और बिहार से एक बटालियन हटाकर बस्तर में तैनात की जा रही है। इससे सर्कार का दबाव नक्सलवादियों पर बढ़ने की संभावना है। 


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि देश को 31 मार्च 2026 तक पूरी तरह से नक्सलवाद मुक्त करने का लक्ष्य है। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में 4,000 से अधिक कर्मियों की चार नई बटालियन तैनात कर रहा है। शाह के अनुसार, नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब अपने अंतिम चरण में है और इसके पूर्ण खात्मे के लिए निर्णायक कार्रवाई की जा रही है।

नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की इस कड़ी कार्रवाई से  केंद्र सरकार नक्सली संगठनों को कमज़ोर कर पाने में कितनी सफल रहेगी इसकी उम्मीद काफी की जा रही है। गौरतलब है कि सुरक्षा बलों ने इस वर्ष नक्सलियों के खिलाफ बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। मुठभेड़ों में अब तक 153 नक्सली मारे जा चुके हैं। सीआरपीएफ की 40 बटालियन पहले से ही छत्तीसगढ़ में तैनात हैं, जिनमें कोबरा इकाइयाँ भी शामिल हैं। अब झारखंड और बिहार में नक्सली गतिविधियों के नियंत्रण के बाद वहां से चार बटालियन हटाकर छत्तीसगढ़ के सबसे अधिक प्रभावित बस्तर क्षेत्र में भेजी जा रही हैं।

अतीत के प्रयोगों से प्रेरित हो कर अब बस्तर में नक्सल विरोधी अभियानों की मजबूत तैयारी का एक नया स्क्रिप्ट लिख लिया गया है। सीआरपीएफ की नई बटालियनों की तैनाती रायपुर से 450-500 किलोमीटर दूर बस्तर के दुर्गम इलाकों में की जाएगी। बल इन क्षेत्रों में फारवर्ड ऑपरेटिंग बेस (एफओबी) स्थापित करेगा, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित होने के बाद विकास कार्यों की शुरुआत की जा सके। छत्तीसगढ़ में पिछले तीन वर्षों में 40 एफओबी स्थापित किए गए हैं, जो नक्सल विरोधी अभियानों को मजबूत करते हैं।

इस अभियान की सफलता के लिए जहां फ़ोर्स की ज़रूरत थी वहीँ तकनीकी तौर भी बहुत कुछ चाहिए था। प्रौद्योगिकी और संसाधनों की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती रही है। 
सीआरपीएफ के अधिकारियों का मानना है कि दक्षिण बस्तर में अभियानों के लिए लगातार तकनीकी और संसाधनों की आवश्यकता होगी। यहां नक्सलियों द्वारा घात लगाकर हमले और विस्फोटक उपकरणों का खतरा बना रहता है, इसलिए बल को हेलीकॉप्टर और अन्य संसाधनों से सुदृढ़ किया जा रहा है। नई बटालियनों की तैनाती का उद्देश्य बस्तर के 'नो-गो' क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करना और तय समय सीमा के भीतर नक्सलवाद को समाप्त करना है।

निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सरकार इस मामले में पूरी तरह से आश्वस्त है। सरकार और सुरक्षा बलों का नक्सलवाद के खिलाफ यह निर्णायक कदम दर्शाता है कि देश नक्सलवाद के खात्मे की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अमित शाह की प्रतिबद्धता और सीआरपीएफ की रणनीति इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। 

अब देखना है कि इस नए अभियान के नतीजे कितनी जल्दी सामने। 

Monday, January 23, 2023

दीपांकर भट्टाचार्य ने की मोदी सरकार की तीखी आलोचना

सोमवार 23 जनवरी 2023 को 09:06 PM पर

देश की संवैधानिक संस्थाओं को खोखला करने का आरोप 


चंडीगढ़: 23 जनवरी 2023: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

भाकपा (माले) लिबरेशन की ओर से यहां दैनिक देश सेवक के परिसर में बने हुए बाबा सोहन सिंह भकना भवन में 'फाशीवाद: विश्व का अनुभव और इसकी भारतीय विशेषताएं' विषय पर एक विशेष सेमिनार का आयोजन किया गया। संगोष्ठी को मुख्य वक्ता के रूप में भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य ने संबोधित किया। सेमिनार की अध्यक्षता कामरेड परषोत्तम शर्मा, सुखदर्शन सिंह नत्त, रुलदू सिंह मनसा, भगवंत सिंह समाओ और सेंट्रल ट्रेड यूनियन एक्टू के नेता सतीश कुमार ने की। कार्यक्रम का संचालन पार्टी की चंडीगढ़ इकाई के सचिव कामरेड कंवलजीत ने किया। 

कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य ने अपने भाषण में कहा कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, संविधान, लोकतंत्र, राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और संघीय ढांचे को लगातार कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 2024 का संसदीय चुनाव देश और देशवासियों के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए भाजपा को हराना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियां विपक्ष की भूमिका में हैं, सभी को अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के खिलाफ मजबूती से लड़ना चाहिए। विपक्षी दलों की एकजुटता के लिए हर राज्य में एक अलग फॉर्मूला हो सकता है। उन्होंने कहा कि देश स्तर पर भाजपा के खिलाफ व्यापक एकता बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। तमिलनाडु, पंजाब, केरल और बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में राज्यपाल खुले तौर पर केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। राज्यपालों के ये कृत्य संघीय ढांचे की अवधारणा और राज्यों के अधिकारों का घोर उल्लंघन हैं, इसलिए देश की एकता को भंग करने वाले ऐसे असंवैधानिक कृत्यों को तुरंत रोका जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार तानाशाह से ज्यादा फाशीवादी शासन की तरह काम कर रही है, जिससे वह सभी संवैधानिक संस्थाओं के अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है। आम जनता रोजगार, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए वोट देती है, लेकिन संघ-भाजपा इसके बजाय अपने कॉर्पोरेट-उन्मुख सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं। आज साम्प्रदायिक ज़हर उगलने वाले, हत्यारे, दंगाई और खरबों के सरकारी धन का गबन करने वाले भ्रष्टाचारी खुले घूम रहे हैं, लेकिन दलितों, मजदूरों, युवाओं, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले और संघर्ष करने वाले सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को झूठ का शिकार बनाया जा रहा है। बहुत से मामलों में जनता की आवाज़ उठाने वालों को झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है और झूठी पुलिस मुठभेड़ों में मौत के घात उतरा जा रहा है। ऐसे जन हितैषी लोगों को उनकी सज़ाएं पूरी होने के बाद भी जेलों से रिहा नहीं किया जा रहा। 

मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' पर एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर राहुल के दौरे से कांग्रेस में कुछ गति आती है तो यह अच्छी बात होगी। उन्होंने कहा कि कम से कम फाशीवाद का मुकाबला करने के लिए आम सहमति के आधार पर देश में एक व्यापक मोर्चा विकसित करने की मुख्य जिम्मेदारी वाम दलों की है। उन्होंने कहा कि पटना में 15 से 20 फरवरी तक होने वाले भाकपा माले के 11वें आम सम्मेलन में मोदी सरकार के खिलाफ व्यापक सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी पर गंभीरता से चर्चा की जाएगी।


मानसा से इस संगोष्ठी में शामिल होने के लिए पहुंचे पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य कामरेड सुखदर्शन नत्त भी अपने परिवार के साथ मौजूद थे। आयोजन के बाद मानसा लौटते हुए चंडीगढ़ के वाईपीएस चौक पर चल रहे राष्ट्रीय इंसाफ मोर्चा में पार्टी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वह लंबे समय से इस पार्टी के साथ रहे हैं और उन्होंने विश्व कम्युनिस्ट आंदोलनों के साथ-साथ भारत में कम्युनिस्ट दलों से जुड़े आंदोलनों के बहुत से उतार-चढ़ाव के दौर भी देखे हैं। वह पार्टी के बहुत ही प्रतिबद्धता से भरे अनुशासित और वरिष्ठ नेता हैं। मानसा से लेकर अमृतसर तक, पंजाब से लेकर यूपी, बिहार और बंगाल तक वह पार्टी के काम से कभी नहीं थकते। उन्होंने पार्टी को पंजाब में मज़बूती से पैठ बनाने और विभिन्न क्षेत्रों के कई आगे की सोच वाले व्यक्तियों, पत्रकारों और लेखकों को पार्टी के करीब लाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। बहुत ही सादगी और नैतिकता का जीवन जीने वाले नत्त परिवार में आलोचकों और विरोधियों की सबसे तीखी बातों को सुनकर भी अपना संतुलन न खोने की जादुई क्षमता मौजूद है। शायद सुखदर्शन नत्त उन कुछ दुर्लभ परिवारों में से एक हैं जिन्होंने अपने बच्चों को भी इस फलसफे और विचारधारा से पूरी तरह जोड़े रखा है। उन्होंने अपने बच्चों को भी इस संघर्ष की कठिनाइयां दी हैं और वह भी मुस्कराते हुए, उन्हें इन सभी मुश्किलों की जानकारी देते हुए। बिना कुछ भी छुपाए शुद्ध संघर्ष की एक विरासत देते हुए।  

स्वयं अधिक से अधिक अध्ययन करना और दूसरों को भी इसके रूबरू कराना सुखदर्शन नत्त के स्वभाव में शामिल है। युवावस्था वाली मौज-मस्ती के दौर में भी वह इस विचारधारा से गंभीरता से जुड़े रहे। वह अभी भी लोगों के कल्याण के बारे में सोचते हैं। सभी मतभेदों से ऊपर उठकर इस आंदोलन को मजबूत करना भी उनकी प्राथमिक चिंताओं में से एक है। उनकी पत्नी जसबीर कौर नत्त भी उनका पूरा समर्थन करती हैं और पार्टी में भी पूरी तरह सक्रिय हैं।

सेमिनार के इस अवसर पर सर्वाधिक आलोचनात्मक और विवादास्पद मामलों पर अपनी टिप्पणी देने वाले प्रख्यात विचारक डॉ. प्यारे लाल गर्ग भी उपस्थित थे। स्वयं पार्टी के पदाधिकारी व अन्य प्रबंधक अभी तक बाबा सोहन सिंह भकना हॉल के बाहर भी नहीं पहुंचे थे, लेकिन डॉ. प्यारे लाल गर्ग पूरे अनुशासन के साथ निश्चित समय पर पहुंचे थे हुए थे। भकना भवन के बाहरी प्रांगण में डॉ. गर्ग बहुत ही विनम्रता और सादगी से प्रांगण के फुटपाथ जैसी सीढ़ी पर बैठे नज़र ऐ। उन्हें देख कर आशंका हुई की इतना बड़ा व्यक्ति इस तरह ज़मीन पर कैसे बैठ सकता है। आशंका दूर करने के लिए उन्हें फोन लगाया तो वह डॉ. प्यारे लाल गर्ग ही निकले। 

कार्यक्रम शुरू होने से पहले, उनके शब्दों ने जीवन के गहरे रहस्यों के बारे में बहुत कुछ सिखाया और समझाया। घर-परिवार से लेकर समाज तक उनकी पारदर्शी सोच और बेबाकी देखकर दिल चाहने लगता है कि ज़िन्दगी में बस उनके जैसा बना जाए। उन्होंने बातों बातों में बताया कि पीजीआई में उनक रूटीन कैसा रहता था। इसके साथ ही घर परिवार के मामले में वह कितना सीधे और स्पष्ट थे।उन्होंने अपने बच्चों को कैसे जीवन की असली शिक्षा दी इस सब üपर कभी अलग से पोस्ट लिखनी है। सही बात यही है कि ऐसी बातें किताबों में नहीं मिलतीं। इस तरह की अनमोल बातों का पता डॉ. गर्ग जैसे दरवेशों के साथ बैठने से ही लगता है। 

इस बीच जब सेमिनार शुरू हुआ तो डॉ. प्यारे लाल गर्ग ने प्रत्येक वक्ता को बड़े ध्यान से सुना। यहां तक कि आदि से अंत तक सबसे पीछे बैठे हुए उन्होंने हर वक्ता के दिल की आवाज भी सुनी थी जो उनकी जुबां तक नहीं आई थी।शैड उन्हें सभी के दिल का एक्सरे अपनी एक निगाह से ही करना अत है। जब मंच के लोगों ने उनसे अनुरोध किया तो उन्होंने मंच पर पहुंचकरभी अपने विचार रखे। उन्होंने संगोष्ठी के मंच से भी बड़ी विनम्रता से अपने विचार रखे। इस छोटे से भाषण की शुरुआत भी बेहद सादगी भरी थी और अंत में माइक को वापिस रखने  की रस्म भी। एक बार फिर बाहर का दृश्य यद्बा आ गया जब थोड़ी ही देर पहले पार्क में चबूतरे पर बैठे रुल्दा सिंह मनसा की तेज़ आवाज फिर से कानों में गूंजने लगी जो उन्होंने डॉ. गर्ग को देखकर कही थी- कि आपको टेलीविज़न पर तो हम रोज़ ही देखते हैं लेकिन आज आमने सामने भी खुले दर्शन कर लिए। डॉ.गर्ग का अद्वितीय व्यक्तित्व अनजान और नए लोगों को भी पलों क्षणों में ही अपना बना लेता है। 

अब चर्चा वहां पहुंचे कुछ और खास मेहमानों की भी। पत्रकार आमतौर पर केवल अपने निर्धारित समय पर कार्यालय पहुंचने, समाचार बनाने, संपादन करने, लेख लिखने और नियुक्तियों की पुष्टि करने, घर लौटने तक ही सीमित रहते हैं, उनके पास किसी अन्य काम के लिए समय बचता भी नहीं है, न ही संपादकीय डेस्क से उठने के बाद ऊर्जा बाकी।  तन मन सब  खाली जैसा हो जाता है। बस थकावट  जो कहती है जल्दी से जा कर सो जाओ। ऐसा लगता है कि अंदर की सभी शक्तियों का किसी ने हरण लिया है।  समाज के चौथे स्तंभ मीडिया में काम करने वाले अधिकांश लोग समाचार पत्रों के कर्तव्यों को पूरा करते करते बहुत जल्द इस दुनिया से चले जाते हैं। जब तक ज़िंदगी रहती है तब तक वे आम जनता से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने में व्यस्त रहते हैं। ऐसे लोग अपने संस्थान से रिटायर हो कर भी कभी रिटायर नहीं होते। अनुभवी पत्रकार हमीर सिंह भी इसी तरह की सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं । वह अक्सर नाज़ुक मुद्दों पर अपनी  बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं । इस अवसर पर हमीर सिंह के साथी सहयोगी और करीबी मित्र भी कभी-कभी उनकी आलोचना करते हैं लेकिन इसने हमीर सिंह की बात, अंदाज़ या विचार ओके कभी प्रभावित नहीं किया। वह अपना  बदलते और  नहीं। उन्हें देख कर याद आ रहा था एक दोहा:

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर! ना काहू से दोस्‍ती, न काहू से बैर!

तो ऐसी ही शख्सियत वाले पत्रकार हमीर सिंह भी इस संगोष्ठी में पहुंचे हुए थे। वह भी डॉ. गर्ग के साथ सबसे पीछे वाली पंक्ति की कुर्सियों पर बैठे थे। उनके साथ जानेमाने स्तंभकार//कालम नवीस और टीवी पत्रकारिता जगत के मौजूदा सितारे एसपी सिंह भी थे लेकिन आयोजकों के आग्रह करने पर भी एस पी सिंह मंच पर नहीं आए, हालांकि, उनकी उपस्थिति इस संगोष्ठी के कवरेज को महत्व दे रही थी।

अंत में उस शख्स का जिक्र किये बिना कहानी अधूरी ही रहेगी जो इस सारे संगठन की जिम्मेदारी बड़े ही हर्षोल्लास से निभाते हुए सबसे मुस्कुरा कर मिल रहा था। भाकपा माले लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के सदस्य व चंडीगढ़ इकाई के प्रभारी कंवलजीत सिंह ने इस पूरे कार्यक्रम को बेहद सहज ढंग से सफल बनाया। न थकान, न कोई खीझ. न ही माथे पर बल जैसी कोई बात।  
कंवलजीत सिंह के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही इस आयोजन को सफल बनाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी के कई युवक-युवतियां और युवा लड़के-लड़कियां सक्रियता दिखते हुए सेमिनार में आए हुए थे। कॉमरेड दीपांकर भट्टाचार्य के चंडीगढ़ में आने की खबर दो-तीन दिन पहले ही सामने आई थी। देश सेवक अखबार के परिसर में बाबा सोहन सिंह भकना हॉल में इस मकसद का विशेष आयोजन था। यूनिवर्सिटी में सक्रिय कंवलजीत सिंह के युबवा साथियों की टीम ने ही इसे सोशल मीडिया के ज़रिए जन जन तक पहुंचा दिया था। अपने मेहबूब नेता दीपांकर को देखने के लिए लोग दूर दराज से आए हुए थे। 
भाकपा(माले) लिबरेशन के महासचिव कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य चंडीगढ़ और पंजाब हरियाणा के इन नौजवानों और छात्रों में कितने ज़्यादा लोकप्रिय हैं, ये इन नौजवानों को देखकर ही पता चल जाता है. ये सभी अपने प्रिय नेता की एक झलक पाने और उनके विचार सुनने पहुंचे थे। आकर्षक और जादू  भरे व्यक्तित्व के मालिक कंवलजीत जल्द ही पार्टी का जनाधार मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

कम्युनिस्ट पार्टियों की विभाजित शक्ति और नक्सलबाड़ी आन्दोलन से जुड़े लोगों की गुटबाजी इस आन्दोलन की मजबूती में बड़ी बाधाएँ हैं। ऐसी बाधाओं को दूर कर इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए सभी ईमानदार व्यक्ति और संगठन भी सक्रिय हैं।


इस गोष्ठी में भी वामपंथी दलों की एकता और मजबूती पर काफी जोर दिया गया था। अब देखना होगा कि अगले महीने पटना साहिब (बिहार) में होने वाली पार्टी की ग्यारहवीं कांग्रेस में पार्टी नेतृत्व क्या क्या नए फैसले लेता है? यह बैठक 15 से 20 फरवरी तक पटना साहिब के गांधी मैदान में होनी है. उल्लेखनीय है कि पार्टी का दसवां कांग्रेस मनसा में आयोजित किया गया था।

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Sunday, May 29, 2022

नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रभाव और प्रासंगिकता पर दावे

दीपंकर बताते हैं कि  हमारा विरोध भी हमारी क्षमता को ही दर्शाता है 

महान नक्सलबाड़ी उभार की 55वीं वर्षगांठ नामक उनका आलेख 25 मई 2022 को उनकी पार्टी वेबसाईट पर प्रकाशित हुआ है। यह आलेख बहुत ही गहनता से काफी कुछ बताता है। पार्टी के उत्थान, दमन और पुनरुत्थान पर बहुत ही सरलता और सादगी से बात करता है। ज़ेह आलेख हमें उपलब्ध करवाया पार्टी  की पंजाब इकाई के राज्य समिति सदस्य कामरेड हरभगवान भीखी ने जो काफी समय से पंजाब और अन्य राज्यों में भी सक्रिय हैं।  पर आपके विचारों की इंतज़ार हमें रहेगी। --सम्पादक 


महान नक्सलबाड़ी उभार की 55वीं वर्षगांठ
 

आधुनिक भारतीय इतिहास बहुत सारे लोकप्रिय जनउभारों का साक्षी रहा है। भारतीय स्वतंत्रता के लंबे संघर्ष को उत्पीड़ित भारतीयों के विभिन्न तबकों के उभारों ने ऊर्जा प्रदान की। वे उत्पीड़ित जो सिर्फ बाहरी औपनिवेशिक सत्ता से ही उत्पीड़ित नहीं थे बल्कि उस सामाजिक ढांचे से भी उत्पीड़ित थे जो भारतीयों पर भीतर से हावी था, जैसे जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, सामंती शक्ति, स्थानीय रजवाड़े और राजशाही।  

यह चाहे पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857-59) की बात हो या फिर गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन जैसी व्यापक जनजागरूकता हो या फिर 1940 के दशक में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले तेभागा और तेलंगाना जैसे किसान उभार हों, उन आदिवासी लोगों और गरीब किसानों, जिनका खून जमींदार, साहूकार और औपनिवेशिक शासक चूसते थे, के विद्रोह जनप्रतिरोध के मुख्य घटक थे।

वास्तविक समानता, स्वतंत्रता और न्याय हासिल करने के सपने को मुकम्मल करने की जद्दोजहद के साथ ये जन उभार 1947 के बाद भी जारी रहे। भूमिहीन किसानों और उत्पीड़ित चाय बागान मजदूरों का 25 मई 1967 का नक्सलबाड़ी उभार, ऐसा ही ऐतिहासिक क्षण है। इसने देश भर में उत्पीड़ितों और युवाओं को तरंगित कर दिया।  

राज्य ने इसे कुचलने के लिए प्राणपण से युद्ध छेड़ दिया। आज के दौर में औपनिवेशिक कालीन उत्पीड़न वाले काले क़ानूनों, हिरासत में हिंसा और न्यायेतर आतंक का अंधाधुंध इस्तेमाल हम देखते हैं, उसको पहला बड़ा बल राज्य दमन की प्रयोगशाला में 1970 के दशक में मिला. परंतु नक्सलबाड़ी की विरासत अपने उभार के 55 वर्षों में हर बीतते दिन के साथ बढ़ती रही, गहराती गयी और इसका विस्तार होता रहा है।  

इस उभार ने 22 अप्रैल 1969 को भाकपा(माले) के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। अलबत्ता इस नवगठित पार्टी को न्यायेतर हिंसा और नरसंहारों समेत भारतीय राज्य के भारी दमन और क्रोध का सामना करना पड़ा जिसमें सुहार्तो के शासनकाल में इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों के कत्लेआम की छाप दिखती थी। लेकिन पार्टी इस तूफान में भी कामयाबी के साथ डटी रही। इसने भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को व्यापक तौर पर ऊर्जा प्रदान की और उसका क्रांतिकारीकरण किया। मोदी काल में असहमति के व्यापक स्वरों को निशाना बनाने के लिए गढ़े गए शब्द “अर्बन नक्सल” का अविवेकी प्रयोग नक्सलबाड़ी की शक्ति और प्रतिरोध क्षमता को दर्शाता है। 

नक्सलबाड़ी के लोकप्रिय मिथक के विपरीत यह कुछ अलग-थलग क्रांतिकारियों की चीनी क्रांति को भारतीय जमीन पर रोपने की अराजकतापूर्ण और दुस्साहसिक कार्यवाही नहीं थी। अगर ऐसा होता तो वह एक अल्पजीवी बुलबुला सिद्ध होता। वह एक जन आलोड़न था, जिसकी गहरी जड़ें, अन्याय और दमन के खिलाफ होने वाले विद्रोहों की भारतीय परंपरा में थी. उसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी और ऊर्जा थी, वह क्रांतिकारी संभावना और परंपरा को महसूस करने की एक साहसपूर्ण कार्यवाही थी।  

कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के भीतर यह तेभागा और तेलंगाना की भावना को पुनर्जीवित करने का सुदृढ़ प्रयास था। आजादी के बाद जनता के मोहभंग और राजनीतिक संक्रमण (1967 के चुनावों में कॉंग्रेस नौ राज्यों में चुनाव हार गयी थी) को एक सुदृढ़ क्रांतिकारी धार देने की कोशिश थी।  

कॉमरेड चारु मजूमदार तेभागा आंदोलन के एक समर्पित संगठक थे और अपने कॉमरेडों की टीम और तराई डूआर्स और दार्जिलिंग व उत्तरी बंगाल के संघर्षशील लोगों के साथ तेभागा के समय के पूरे अनुभव और विकसित अंतर्दृष्टि का उपयोग उन्होंने नक्सलबाड़ी के उभार को विकसित करने में लगाया। भाकपा(माले) की स्थापना और तेज़ गति से फैलाव ने क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन की गहरी जड़ों, उसके प्रति जनता का आकर्षण और शक्ति को प्रदर्शित किया और जिस तरह से 1970 के घोषित आपातकाल से लेकर फासीवादी हमले के वर्तमान शासन तक यह आंदोलन अपनी जमीन को मजबूती से पकड़े रखने और अपने क्षितिज को विस्तारित करने में कामयाब रहा, वह इसकी अंतर्निहित शक्ति और जीवंतता को प्रदर्शित करता है। 

नक्सलबाड़ी की 55वीं वर्षगांठ पर आंदोलन के शहीदों, इस महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले नेताओं व कार्यकर्ताओं तथा उन सभी कवियों, गायकों और संघर्षों के इलाकों की जनता के प्रति—जिन्होंने इसके संदेश को पूरे भारत में फैलाया तथा जबर्दस्त दमन झेलते हुए साहस, ऊर्जा और प्यार के सा​थ आंदोलन को कायम रखा—हम अपना सम्मान प्रकट करते हैं। नक्सलबाड़ी, उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ जनप्रतिरोध की अपराजेय भावना का प्रतीक बन गया है। यह सत्ता के मद में चूर शासकों की हेकड़ी और आक्रामकता के विरुद्ध संघर्षशील जनगण की विजयी मुस्कान है. नक्सलबाड़ी को लाल सलाम!  

-दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव भाकपा (माले)

Wednesday, February 23, 2022

रूस की तरफ से सैन्य आक्रामकता का प्रदर्शन चिन्ता का विषय

भाकपा (माले) ने रूस को आड़े हाथों लिया 


नई दिल्ली
: 22 फरवरी 2022: (नक्सलबाड़ी ब्यूरो)::

यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर लेफ्ट पूरी तरह से एकमत नहीं हो पा रहा। इसी बीच भाकपा (माले) ने रूस के साथ साथ अमेरिका और नाटो को भी अपने निशाने पर रखा है। भाकपा(माले) केन्द्रीय कमेटी ने स्पष्ट कहा है कि हम अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा यूक्रेन को लेकर फैलाये जा रहे युद्धोन्माद की कड़ी भर्त्सना करते हैं. नाटो देशों को पूर्वी यूरोप में पैर पसारने के प्रयासों पर रोक लगानी चाहिए. अमेरिका व ब्रिटेन भले ही नाटो को एक सुरक्षात्मक गठबंधन बताते रहें, सच तो यह है कि अफगानिस्तान, यूगोस्लाविया और लीबिया में पिछले वर्षों में, या उसके पहले ईराक पर युद्ध थोपने में, उनकी कारगुजारियां निस्संदेह साम्राज्यवादी हितों को साधने वाली रही हैं। 

इसके साथ पार्टी ने यह भी कहा है कि यूक्रेन की सीमाओं पर रूस द्वारा किया जा रहा सैन्य आक्रामकता का प्रदर्शन भारी चिन्ता का विषय है। पार्टी ने कहा है कि वर्तमान संकट का हल यूक्रेनी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से परस्पर बातचीत के द्वारा किया जाना चाहिए। 

इस टकराव के समाधान की दिशा में रूस को यूक्रेन की सीमाओं से अपनी सेनायें तत्काल वापस बुला लेनी चाहिए और रूस एवं अमेरिका व नाटो को यूक्रेन में कोई भी हस्तक्षेप तत्काल बंद कर तनाव को कम करने लिये मिन्स्क—2 समझौते के आधार पर कूटनीतिक समाधान निकालना चाहिए.

हम अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा यूक्रेन को लेकर फैलाये जा रहे युद्धोन्माद की कड़ी भर्त्सना करते हैं. नाटो देशों को पूर्वी यूरोप में पैर पसारने के प्रयासों पर रोक लगानी चाहिए. अमेरिका व ब्रिटेन भले ही नाटो को एक सुरक्षात्मक गठबंधन बताते रहें, सच तो यह है कि अफगानिस्तान, यूगोस्लाविया और लीबिया में पिछले वर्षों में, या उसके पहले ईराक पर युद्ध थोपने में, उनकी कारगुजारियां निस्संदेह साम्राज्यवादी हितों को साधने वाली रही हैं.

हम रूस व यूरोप में चल रहे युद्ध विरोधी आन्दोलनों के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करते हुए वहां चल रहे नये हथियार नियंत्रण समझौतों और उस महाद्वीप में आणविक निशस्त्रीकरण की सभी कोशिशों का समर्थन करते हैं। 

Friday, November 12, 2021

एक करोड़ रुपयों के ईनाम वाले किशन दा गरिफ्तार

जंगलों में रह कर भी संचालित करते रहे माओवादी अभियान 

सारंडा वन जहां किशन दा कई बार अज्ञातवास में रहे 
रांची: 12 नवंबर 2021: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

रांची से आ रही है बहुत बड़ी खबर। सुरक्षा बलों का हाथ नक्सली अभियान पर भरी बना हुआ है। एक शीर्ष नेता प्रशांत किशोर उर्फ़ किशन दा को उनकी पत्नी सहित गरिफ्तार कर लिया गया है। उनके दो और साथी भी ग्रिफ्तार किए गए हैं। इस तरह कुल चार लोग ग्रिफ्तार किए गए। प्रशांत बोस उर्फ़ किशन दा के कई और नाम भी थे। उन्हें ग्रिफ्तार करने की सक्रिय कोशिश चार दशकों से चल रही थी। पांच राज्यों की पुलिस उनके पीछे थी। 

माओवाद के खिलाफ दिनरात एक करके अभियान चला रहे सुरक्षा बलों को उस समय बहुत बड़ी सफलता मिली जब उन्होंने एक करोड़ रुपयों के इनाम वाले शीर्ष नक्सलवादी नेता को गरिफ्तार कर लिया। भाकपा माओवादियों के शीर्ष पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रशांत बोस उर्फ किशन दा, उनकी पत्नी शीला मरांडी समेत चार माओवादियों को झारखंड पुलिस ने शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया। प्रशांत बोस माओवादियों के ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो का सचिव भी हैं। वहीं प्रशांत बोस की पत्नी शीला मरांडी भी माओवादियों की शीर्ष सेंट्रल कमेटी की सदस्य है। वह माओवादियों के फ्रंटल आर्गेनाइजेशन नारी मुक्ति संघ की प्रमुख भी है। बहुत से स्थानों पर पार्टी को खड़ा करने में बोस की भूमिका बहुत ही उल्लेखनीय रही। सरकारी नज़र से इस इनामी नक्सलवादी लीडर की अहमियत इसी बात से पता चल जाती है कि प्रशांत बोस पर झारखंड में 70 से अधिक माओवादी कांड दर्ज है।

प्रशांत को गरिफ्तार किए जाने का विस्तृत विवरण भी बहुत दिलचस्प है। झारखंड पुलिस के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी ने प्रशांत बोस समेत अन्य के गिरिडीह के पारसनाथ से सरायकेला लौटने की जानकारी दी थी। इसके बाद सरायकेला पुलिस ने एक स्कार्पियो गाड़ी से प्रशांत बोस, शीला मरांडी, प्रशांत बोस के प्राटेक्शन दस्ता के एक सदस्य व कुरियर का काम करने वाले एक युवक को मुंडरी टोलनाका के पास से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद चारों माओवादियों को गुप्त स्थान पर रखकर पूछताछ की जा रही है। झारखंड पुलिस ने प्रशांत बोस पर एक करोड़ का ईनाम रखा हुआ है। इनाम की इतनी बड़ी राशि से ही पता चल जाता है कि पुलिस और अन्य सुरक्षा बल इसकी गरिफ्तारी के लिए कितने परेशान रहे होंगें। गौरतलब है कि प्रशांत बोस पर झारखंड में 70 से अधिक माओवादी कांड दर्ज है। शायद अन्य राज्यों की सरगर्मियां मिला कर यह लिस्ट और भी  लम्बी हो जाए।  

लम्बे समय से बीमारी का भी है प्रकोप कोलकाता जाकर करवाता था इलाजअज्ञातवास का जीवन आसान तो नहीं होता। इसके साथ ही उम्र भी काफी है। बहुत सी कठिनाइयां होती हैं इस सब से। छोटीमोटी कई बीमारियां लग जाती हैं जिनका इलाज आवश्यक हो जाता है। पूछताछ में पुलिस को जानकारी मिली है कि प्रशांत बोस की तबीयत बीते कई सालों से खराब थी। लेकिन इसके बावजूद वह लगातार अपने इस संगठन में सक्रिय रहा जिसके लिए वह हमेशां प्रतिबद्ध रहा। जानकारी के मुताबिक प्रशांत दा कोल्हान से पारसनाथ जाकर रह रहा था। पारसनाथ से ही वह प्रोटेक्शन दस्ता के सदस्यों के द्वारा एनएच 2 तक लाया जाता था। इसके बाद कुरियर के द्वारा ही प्रशांत बोस को कोलकाता ले जाया जाता था। हाल ही में प्रशांत बोस कोलकाता से लौटा था। इस तरह इलाज के लिए आने जाने के लिए भी सफर की जो प्रक्रिया अपने जाती वह कम दिलचस्प नहीं है। हर कदम पर सावधानी और सनसनी एक साथ चलते। माओवादी संगठन में इतने बड़े पद पर आसीन प्रशांत दा के लिए इतनी वशिष्ट किस्म की सुरक्षा व्यवस्था स्वाभाविक ही थी। उसका पद बेहद महत्वपूर्ण पद है। 

माओवादी संगठन एमसीसीआई का प्रमुख था प्रशांत बोस

माओवादी विचारधारा को समर्पित संगठनों में पद और ज़िम्मेदारी दोनों बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। माओवादी संगठनों में से कोई अज्ञातवास में चल रहा हो या खुले तौर पर सक्रिय हो दोनों ही तरह के संगठनों में पद, जिम्म्मेदारी और प्रस्ताव लागू करना अहम रहता है। जितना बड़ा पद उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी। प्रशांत बोस के पास ईआरबी के सचिव के तौर पर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के झारखंड के सीमावर्ती इलाके, असम समेत पूर्वोतर के राज्यों का प्रभार था। साल 2004 में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर आफ इंडिया (एमसीसीआई) और पीपुल्ज़ वार ग्रुप (पीडब्लूजी) के विलय के पूर्व वह एमसीसीआई का प्रमुख था। विलय के बाद भाकपा माओवादी संगठन में कोटेश्वर राव को प्रमुख बनाया गया था, जबकि बतौर ईआरबी सचिव तब से प्रशांत बोस संगठन में सेकेंड इन कमान था। झारखंड में पारसनाथ, सारंडा, ओड़िसा और बंगाल के सीमावर्ती इलाके में प्रशांत बोस ने ही संगठन को खड़ा किया था। प्रशांत बोस मूलत: पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के यादवपुर का रहने वाला है। पश्चिम बंगाल की पृष्ठभूमि होने के कारण सख्तियों भरी ज़िंदगी जीने के भी आदी बन गए थे प्रशांत दा। 

वृद्धावस्था में संभाले बैठे थे अनुभवों का खज़ाना 

नक्सलवाद और माओवाद के रास्ते पर चलते चलते हुए प्रशांत दा की उम्र तो बढ़ गई लेकिन साथ ही बढ़ गया अनुभवों का खज़ाना। थ्यूरी के साथ साथ प्रेक्टिस में भी बहुत से नए अनुभव मिले। इन नए अनुभवों से थ्यूरी और तीखी होती चली गई। विचारधारा के आधार की ज़मीन और परमार्जित होती रही। इन्हीं अनुभवों के चलते संगठन के नए यूनिट खड़े करने और मौजूदा यूनिटों को मज़बूत करने में उनको महारत हासल है। स्थानीय राजनीति, स्थानीय समस्याओं और स्थानीय हालात व् पर्यावरण के चलते इन अनुभवों से बहुत ही सहायता मिलती है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही नक्सली संगठन अपने नए एक्शन प्लान तैयार करते हैं। 

अज्ञातवास के जीवन में भी बहुत एक्सपर्ट भी रहे 

प्रशांत बोस उर्फ़ किशन दा अज्ञातवास की ज़िंदगी के बहुत ही अभ्यस्त रहे और इसमें निपुण भी हो गए ,जल्दी किए उनकी सरगर्मियां किसी की नज़र में न न आतीं। करीब पांच वर्ष पूर्व तो स्थिति यह बन गई थी उनके ज़िंदा होने का भी सरकार को कुछ पक्का पता नहीं था। उन दिनों उनके ही निकट एक सहयोगी को बयान देना पड़ा कि किशन दा ज़िंदा हैं और कमान उनके हाथ में है। ये भी खबर थी कि किशन दा जीवित नहीं है। मगर 25 लाख के इनामी नक्सली कमांडर कान्हू मुंडा ने खुलासा किया था कि किशन दा जिंदा हैं। वही नक्सलवाद की कमान संभाले हुए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह वे बंगाल के जंगलों में नहीं, झारखंड के सारंडा जंगल से नक्सल गतिविधियां चला रहे हैं। झारखंड सरकार ने उस पर एक करोड़ का इनाम रखा है।

 किशन दा सारंडा सहित कई जगहों पर शरण लेते रहे

पांच सात वर्ष पूर्व के उस दौर में भी किशन दा पर ओड़िशा, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार ने भी इनाम घोषित कर रखा है।  किशन दा ने असीम मंडल उर्फ आकाश को कोल्हान समेत पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में संगठन मजबूत करने की जिम्मेवारी सौंपी है। उन दिनों में भी प्रशांत उर्फ़ किशन दा सारंडा सहित कई जगहों पर शरण लेते रहे। झारखंड  सारंडा के जंगल बहुत गहन जंगल हैं। सारंडा वन झारखंड-ओडिशा सीमा में फैला हुआ है, और यहाँ बड़ी संख्या में पशु, पक्षी और सरीसृप प्रजातियां पाई जाती हैं। 'सारंडा' शब्द का अर्थ है हाथियों और वन को इसका नाम बड़ी संख्या में यहाँ रहने वाले हाथियों के कारण मिलता है। जंगल दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है, जहां लुप्तप्राय उड़ने वाली छिपकली रहती है। इस तरह यह एक महत्वपूर्ण स्थान है जो सैलानी स्थल ही है। सैलानी स्थल होने के कारण यहां अज्ञातवास के बावजूद जनसाधारण में से सिलेक्टिड लोगों से राब्ता बनाना आसान हो जाता है। 


Sunday, September 26, 2021

नई दिल्ली में वामपंथी उग्रवाद पर समीक्षा बैठक

प्रविष्टि तिथि: 26 SEP 2021 4:10 PM by PIB Delhi

 केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने  की अध्यक्षता 


नई दिल्ली
: 26 सितंबर 2021: (पीआईबी//नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

नक्सलवाद से प्रभावित राज्यों की समीक्षा के लिए एक विशेष बैठक गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई। जिसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। विच्जविमर्श में कई बातें उभर कर सामने आईं। जो तथ्य और नुक्ते इस समीक्षा में सामने आए उनका संक्षिप्त रूप हम सबसे पहले दे रहे हैं। 

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए कटिबद्ध है

*प्रधानमंत्री की अगुवाई में वामपंथी उग्रवाद पर नकेल कसने में मिल रही है सफलता 

*केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों से लगातार कामयाबी मिल रही है 

*दशकों की लड़ाई में हम ऐसे मुकाम पर पहुंचे हैं जहाँ सफलता निकट है 

*पहली बार मृत्यु की संख्या 200 से कम है और यह बहुत बड़ी उपलब्धि है

*जब तक हम वामपंथी उग्रवाद की समस्या से पूरी तरह निजात नहीं पाते तब तक देश का और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों का पूर्ण विकास संभव नहीं

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तैनाती पर होने वाले राज्यों के स्थायी ख़र्च में कमी लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है

*इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2018-19 के मुक़ाबले 2019-20 में CAPFs की तैनाती पर होने वाले राज्यों के ख़र्च में लगभग 2900 करोड़ रूपए की कमी आई है

*भारत सरकार कई सालों से राजनीतिक दलों पर ध्यान दिये बिना दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ती रही है, जो हथियार छोड़कर लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं उनका दिल से स्वागत है लेकिन जो हथियार उठाकर निर्दोष लोगों और पुलिस को आहत करेंगे, उनको उसी तरह जवाब दिया जायेगा

*असंतोष का मूल कारण आज़ादी के बाद 6 दशकों में विकास ना पहुंच पाना है, लेकिन अब प्रधानमंत्री जी की अगुवाई में विकास हो रहा है और नक्सली भी ये बात समझ चुके हैं कि विकास होने पर निर्दोष लोग उनके बहकावे में नहीं आएंगे इसीलिए विकास की गति निर्बाध रूप से जारी रखना बहुत ज़रूरी है

*जिस समस्या के कारण पिछले 40 वर्षों में 16 हज़ार से अधिक नागरिकों की जान गई हैं, उसके ख़िलाफ़ लड़ाई अब अंत तक पहुंची है और इसकी गति बढ़ाने और इसे निर्णायक बनाने की ज़रूरत है

*हाल ही में भारत सरकार ने अनेक उग्रवादी गुटों, विशेषकर उत्तरपूर्व में, के साथ समझौता कर उनसे हथियार डलवाने में सफलता हासिल की है

*वामपंथी उग्रवादियों के आय के स्रोतों को निष्प्रभावी करना बेहद ज़रूरी है

अब चर्चा विस्तार से:

भारत सरकार वाम उग्रवाद को समाप्त करने में लगातार सक्रिय है। जंग और नीति दोनों पर ध्यान दिया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री, श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में वामपंथी उग्रवाद पर एक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में केन्द्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री, श्री गिरिराज सिंह, जनजातीय मामलों के मंत्री श्री अर्जुन मुंडा, दूरसंचार, सूचना-प्रौद्योगिकी और रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव, सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय भी उपस्थित थे। 

बैठक में बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और झारखंड के मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश की गृह मंत्री, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और केरल के वरिष्ठ अधिकारी, केन्द्रीय गृह सचिव, केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के शीर्ष अधिकारी और केन्द्र तथा राज्य सरकार के अनेक वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए कटिबद्ध है। उन्होंने कहा कि यह आनंद का विषय है कि प्रधानमंत्री जी की अगुवाई में वामपंथी उग्रवाद पर नकेल कसने में केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों से बहुत सफलता मिली है। श्री शाह ने कहा कि एक तरफ जहां वामपंथी उग्रवाद की घटनाओं में 23 प्रतिशत की कमी आई है वहीं मौतों की संख्या में 21 प्रतिशत की कमी आई है। श्री अमित शाह ने कहा कि दशकों की लड़ाई में हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे हैं जिसमें पहली बार मृत्यु की संख्या 200 से कम है और यह हम सबकी साझा और बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि हम सब जानते हैं कि जब तक हम वामपंथी उग्रवाद की समस्या से पूरी तरह निजात नहीं पाते तब तक देश का और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों का पूर्ण विकास संभव नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इसको खत्म किए बिना न तो लोकतन्त्र को नीचे तक प्रसारित कर पाएंगे और न ही अविकसित क्षेत्रों का विकास कर पाएंगे, इसलिए हमने अब तक जो हासिल किया है उस पर संतोष करने की बजाय जो बाकी है उसे प्राप्त करने के लिए गति बढ़ाने की जरूरत है।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत सरकार कई सालों से राजनीतिक दलों पर ध्यान दिये बिना दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ती रही है। श्री शाह ने कहा कि जो हथियार छोड़कर लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं उनका दिल से स्वागत है लेकिन जो हथियार उठाकर निर्दोष लोगों और पुलिस को आहत करेंगे, उनको उसी तरह जवाब दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि असंतोष का मूल कारण है आज़ादी के बाद पिछले 6 दशकों में विकास ना पहुंच पाना, इससे निपटने के लिए वहां तेज़ गति से विकास पहुंचाना और आम जनता और निर्दोष लोग उनके साथ ना जुड़ें, ऐसी व्यवस्था करना अति आवश्यक है। श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में विकास हो रहा है और अब नक्सली भी ये बात समझ चुके हैं कि विकास होने पर निर्दोष लोग उनके बहकावे में नहीं आएंगे इसीलिए विकास की गति निर्बाध रूप से जारी रखना बहुत ज़रूरी है। इन दोनों मोर्चों पर सफल होने के लिए ये बैठक बहुत मह्त्वपूर्ण है। उन्होंने राज्यों से आग्रह किया कि वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए प्रभावित राज्यों के मुख्य सचिव कम से कम हर तीन महीने में पुलिस महानिदेशक और केन्द्रीय ऐजेंसियों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करें, तभी हम इस लड़ाई को आगे बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो साल में जिन क्षेत्रों में सुरक्षा पहुंच नहीं थी, वहां सुरक्षा कैंप बढ़ाने का काफी बड़ा और सफल प्रयास किया गया है, विशेषकर छत्तीसगढ़ में, साथ ही महाराष्ट्र और ओडिशा में भी सुरक्षा कैंप बढ़ाए गए हैं। श्री शाह ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के स्तर पर नियमित समीक्षा की जाती है, तो निचले स्तर पर समन्वय की समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। श्री अमित शाह ने कहा कि जिस समस्या के कारण पिछले 40 वर्षों में 16 हज़ार से अधिक नागरिकों की जान गई हैं, उसके ख़िलाफ़ लड़ाई अब अंत तक पहुंची है और इसकी गति बढ़ाने और इसे निर्णायक बनाने की ज़रूरत है।

श्री अमित शाह ने कहा कि हाल ही में भारत सरकार ने अनेक उग्रवादी गुटों, विशेषकर उत्तरपूर्व में, के साथ समझौता कर उनसे हथियार डलवाने में सफलता हासिल की है। बोड़ोलैंड समझौता, ब्रू समझौता, कार्बी आंगलोंग समझौता और त्रिपुरा के उग्रवादियों द्वारा आत्मसमर्पण समेत अबतक लगभग 16 हज़ार कैडर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि जितने भी लोग हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहते हैं, उनका हम स्वागत करते हैं।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि राज्य प्रशासन को सक्रिय होकर केन्द्रीय बलों के साथ तालमेल के साथ आगे बढ़ना चाहिए। श्री अमित शाह ने कहा कि केन्द्रीय बलों के बारे में जिन राज्यों ने मांग भेजी हैं, उन्हें पूरा करने का प्रयास किया गया है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तैनाती पर होने वाले राज्यों के स्थायी ख़र्च में कमी लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2018-19 के मुक़ाबले 2019-20 में CAPFs की तैनाती पर होने वाले राज्यों के ख़र्च में लगभग 2900 करोड़ रूपए की कमी आई है। प्रधानमंत्री ने निरंतर इसकी समीक्षा की है और लगातार हम सबका मार्गदर्शन कर रहे हैं।

श्री अमित शाह ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों के आय के स्रोतों को निष्प्रभावी करना बेहद ज़रूरी है। केन्द्र और राज्य सरकारों की ऐजेंसियों को मिलकर एक व्यवस्था बनाकर इसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह करते हुए कहा कि वे वामपंथी उग्रवाद की समस्या को अगले एक साल तक प्राथमिकता दें, जिससे इस समस्या का स्थायी समाधान हो सके। उन्होंने कहा कि इसके लिए दबाव बनाने, गति बढ़ाने और बेहतर समन्वय की ज़रूरत है।

वामपंथी उग्रवाद पिछले कई दशकों से एक अहम सुरक्षा चुनौती रहा है। हालांकि यह मुख्य रूप से राज्य का विषय है लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने वामपंथी उग्रवाद के ख़तरे से समग्र रूप से निपटने के लिए 2015 से एक ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' बनाई है। इस योजना की प्रगति और स्थिति की लगातार सघन निगरानी की जा रही है और यह एक बहुआयामी दृष्टिकोण वाली नीति है।

प्रभावित क्षेत्रों में ग़रीब और कमज़ोर वर्ग तक विकास पहुंचाने के लिए विकासशील गतिविधियों पर अधिक ज़ोर देने के साथ ही हिंसा के प्रति शून्य सहिष्णुता, वामपंथी उग्रवाद के ख़तरे से निपटने की ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

इस नीति के अंतर्गत, केन्द्रीय गृह मंत्रालय, सीएपीएफ बटालियनों की तैनाती, हेलीकॉप्टरों और यूएवी के प्रावधान और भारतीय रिजर्व बटालियनों (आईआरबी) / विशेष भारत रिजर्व बटालियनों (एसआईआरबी) की मंजूरी के जरिए क्षमता निर्माण और सुरक्षा तंत्र की मज़बूती के लिए राज्य सरकारों को समर्थन दे रहा है। राज्य पुलिस के आधुनिकीकरण और प्रशिक्षण के लिए पुलिस बल के आधुनिकीकरण (एमपीएफ), सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजना और विशेष बुनियादी ढांचा योजना (एसआईएस) के तहत भी धनराशि उपलब्ध कराई जाती है।

वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों के विकास के लिए, भारत सरकार ने कई विकासात्मक पहल की हैं जिनमें 17,600 किलोमीटर सड़कों को मंज़ूरी शामिल है, जिसमें से 9,343 किलोमीटर सड़कों का निर्माण आरआरपी-I, आरसीपीएलडब्ल्यूई के तहत पूरा हो चुका है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों में दूरसंचार सुविधाओं में सुधार के लिए 2,343 नए मोबाइल टावर लगाए गए हैं और अगले 18 महीनों में 2,542 अतिरिक्त टावर लगाए जाएंगे। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों में लोगों के वित्तीय समावेशन के लिए 1,789 डाकघर, 1,236 बैंक शाखाएं, 1,077 एटीएम और 14,230 बैंकिंग प्रतिनिधि खोले गए हैं और अगले एक वर्ष में 3,114 डाकघर और खोले जाएंगे। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) खोलने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों के लिए कुल 234 ईएमआरएस स्वीकृत किए गए हैं, इनमें से 119 कार्यरत हैं।

सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों में विकास को और गति देने के लिए विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) योजना के तहत, 10,000 से अधिक परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें से 80% से अधिक पूरी हो चुकी हैं। इस योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को 2,698.24 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। एसआईएस के तहत 992 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है और 152 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि जारी कर दी गई है। एसआरई के तहत अप्रैल, 2014 से पिछले 7 वर्षों में 1,992 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है, जो कि सात वर्षों से पहले की अवधि की तुलना में 85% अधिक है।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने कुछ ज़िलों को वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों के रूप में वर्गीकृत किया था और वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए प्रभावित राज्यों को विशिष्ट संसाधन जुटाने के लिए सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजना के तहत कवर किया था। इन एसआरई जिलों में से, देश भर में वामपंथी उग्रवाद संबंधी हिंसा वाले ज़िलों में से 85% से अधिक जिलों को सुरक्षा और विकास से संबंधित संसाधनों की केन्द्रित उपलब्धता के लिए 'सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों' के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

पिछले एक दशक में, हिंसा के आंकड़ों और इसके भौगोलिक फैलाव, दोनों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। वामपंथी उग्रवाद संबंधित हिंसा की घटनाएं 2009 में 2,258 के उच्चतम स्तर से 70% कम होकर वर्ष 2020 में 665 रह गई हैं। मौतों की संख्या में भी 82% की कमी आई है जो वर्ष 2010 में दर्ज 1,005 के उच्चतम आंकड़े से घटकर वर्ष 2020 में 183 रह गई हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले ज़िलों की संख्या भी वर्ष 2010 में 96 से वर्ष 2020 में घटकर सिर्फ 53 ज़िलों तक सीमित रह गई है। माओवादियों को अब सिर्फ़ कुछ ही इलाक़ों में 25 ज़िलों तक सीमित कर दिया गया है जो कि देश के कुल वामपंथी उग्रवाद की 85% हिंसा के लिए ज़िम्मेदार हैं।

बेहतर स्थिति के कारण, एसआरई जिलों की संख्या की पिछले तीन वर्षों में दो बार समीक्षा की गई, जो अप्रैल, 2018 में 126 ज़िलों से घटकर 90 और फिर जुलाई, 2021 में 70 हो गए। सबसे अधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों की संख्या भी अप्रैल, 2018 में 35 से घटकर 30 और फिर जुलाई, 2021 में इसे और कम करके 25 कर दिया गया।

वामपंथी उग्रवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई अब महत्वपूर्ण चरण में है और सरकार जल्द ही इस ख़तरे को बेहद कम करने के प्रति आशान्वित है।

वामपंथी आतंकवाद के भौगोलिक प्रसार में कमी की बात नोट की गई है। मीटिंग में जो तथ्य प्रस्तुत किए गए वे तथ्य इस कमी को ही दर्शाते हैं। 


इसी तरह वामपंथी उग्रवाद संबंधी घटनाएं भी लगातार कम होती जा रही हैं। सरकार इस दिशा में भी पूरी तरह से अग्रसर है। 


इस कमी के परिणामस्वरूप मौतें भी कम हो रही हैं। गौरतलब है की नक्सल अभियान में बहुत सी अनमोल जानें जा चुकी हैं। 


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एनडब्ल्यू  / आरके / एवाई / आरआर

Thursday, September 2, 2021

कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि कार्यक्रम 12 सितंबर को होगा

 2nd September 2021:04:29 PM

 जीवन भर वाम और बदलाव को समर्पित रहे कामरेड रामनाथ 

चंडीगढ़: 02 सितंबर 2021: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

वाम बार बार बंटा। बार बार टूटा। कई नए संगठन खड़े हुए। कई नए दल बने। बंट कर भी, अलग अलग हो कर भी ये लोग किसी न किसी रूप में इसी विचारधारा को मज़बूत बनाते रहे और आगे चलाते रहे। इस अभियान के लिए बहुत से लोग चुपचाप खामोशी से काम करते रहे। उनकी साधना बहुत लम्बी भी है और महत्वपूर्ण भी। बहुत सी कुर्बानियां हैं उनकी। इन्हीं में से एक थे कामरेड रामनाथ। 

भारत की कम्युनिस्ट लीग (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के संस्थापक कॉमरेड रामनाथ बीती 31 अगस्त को हमारे बीच नहीं रहे। उनकी उम्र अस्सी साल से ऊपर थी, वह लम्बे समय से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे और अब दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी याद में श्रद्धांजलि समागम 12 सितबंर को गुरशरन कला भवन, मुल्लांपुर में किया जा रहा। यह जानकारी मार्क्सवादी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर की और से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में दी गई। उन्होंने कहा है कि कॉमरेड रामनाथ का निधन भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन को न पूरी हो सकने वाली क्षति है।

*कॉमरेड सुखविंदर ने बताया कि कॉमरेड रामनाथ के जीवन का बड़ा हिस्सा (लगभग छः दशक) भारत की मेहनतकश जनता के मुक्ति संग्राम को समर्पित रहा। उनके क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से हुई। 1964 में इस पार्टी में फूट पड़ने के बाद वे नई बनी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में शामिल हो गए। 1969 में भाकपा (मा.ले.) बनने के बाद राम नाथ इस पार्टी में शामिल हुए। 1978 में उनके नेतृत्व में भारत की कम्युनिस्ट लीग (मा.ले.) की स्थापना हुई। उन्होंने भारतीय समाज का गहराई से अध्ययन किया, नव-जनवादी क्रांति के कठमुल्लेपन को तोड़कर, समाजवादी क्रांति का कार्यक्रम दिया। उन्होंने कम्युनिस्ट आन्दोलन को आज़ादाना सोच की वैज्ञानिक हिम्मत दी। उन्होंने कहा कि कॉमरेड रामनाथ अपने पीछे एक समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं, जिसे आत्मसात करते हुए समाजवादी क्रांति की दिशा में जनांदोलन को आगे बढ़ाना हमारा कार्यभार है। उन्होंने कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि समागम में आन्दोलन के कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों को पहुँचने की अपील की है।

*कामरेड सुखविदंर प्रतिबद्ध के सम्पादक भी हैं और इस क्षेत्र के ज्ञान पर उनकी काफी पकड़ है।  

Sunday, September 13, 2020

नक्सली रोशनलाल राणा और सुनील कुमार गिरफ्तार

 पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़े हैं दोनों 
 हजारीबाग:13 सितंबर 2020: (सोशल मीडिया//इंटरनेट//नक्सलबाड़ी स्क्रीन)::
मध्य भारत की नक्सली सरगर्मियों पर
पंजाबी पत्रिका सुर्ख रेखा का विशेषांक 
प्रतीकात्मक तस्वीर 
कोरोना का कहर बुरी तरह सामने आने के बावजूद नक्सली संगठनों की गतिविधियों में कोई रुकावट या धीमी गति जैसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। पंजाब से पंजाबी में छपती नक्सली पत्रिकाओं के मुताबिक नक्सली संगठन पूरे जोशो खरोश के साथ अपनी सरगर्मियां चला रहे हैं। साथ ही वे अपनी मीटिंगें भी कर रहे हैं और सम्मेलन भी आयोजित कर रहे हैं। इन पत्रिकायों से जुड़े सूत्रों  के मुताबिक नक्सली संगठन परम्परिक  मुकाबले अधिक काम कर रहे हैं।  पंजाबी की नक्सली पत्रिका "सुर्ख रेखा" ने अपने मार्च-अगस्त 2020 के अंक को इस बार विशेषांक के तौर पर प्रस्तुत किया है। इसमें चार पृष्ठों का रंगीन कवर है और बाकी 138 पृष्ठ अलग हैं। इस तरह कुल कुल-142 पृष्ठ की इस पत्रिका की कवर परे कीमत लिखी है 60/- रूपये।  इस विशेष अंक में इस बार भी क़ाफी कुछ है। कवर स्टोरी सीपीआई (माओवादी) के बस्तर सम्मेलन को बनाया गया है और इसकी तस्वीरें भी फ्रंट पेज पर प्रकशित की गयी हैं। पत्रिका के मुताबिक यह सम्मेलन कोरोना काल के नियमों और बंदिशों की धज्जियां उड़ाते हुए 18 से 20 जून 2020 तक हुआ। इस मौके पर आदिवासियों की  बस्तर में की गई नाकाबंदी की तस्वीर भी दिखाई गई है जिसमें प्रवेश वर्जित के बैनर लगे भी नज़र आते हैं। इस स्टोरी के ज़रिये यह कहने की कोशिश की गयी कि बस्तर में सीपीआई (माओवादी)की ही चलती है। इसी तरह के प्रचार से पंजाब में भी इस आंदोलन को फिर से खड़ा करने की कोशिशें नज़र आती हैं। 
इसी तरह सुरक्षा बलों की खबरें भी आ रही हैं। झारखंड के हजारीबाग में पुलिस के हाथ पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI) के दो नक्सलियों को पकड़ने में कामयाबी लगी है जो लगातार ऑयल एंड नेचुरल गैस कार्पोरेशन (ओएनजीसी) के अधिकारियों को रंगदारी देने के लिए लगातार धमकियों दे रहे थे। यह सिलसिला काफी देर से जारी था। आखिर तंग आ कर जब कम्पनी ने इसका खुलासा सुरक्षा बलों से किया तो नक्सली कारकुनों को पकड़ने के लिए  जाल बिछाया गया। गौरतलब है कि जिस पैसे को लोग या प्रशासन रंगदारी कहता है कम्युनिस्ट संगठनों में उसी पैसे को लेवी कहा जाता है। यह लेवी पार्टी स्वयं के कारकुनों और अन्य जानकारों से भी मांग सकती है। कम्युनिस्ट आंदोलनों के फंड की कमी इसी तरफ पूरी होती है।  
नक्सलियों को पकड़े जाने के घटनाक्रम पर हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक कार्तिक एस ने मीडिया को बताया कि पीएलआफआई के दोनों नक्सलियों को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी कर शनिवार की रात को धर दबोचा। उन्होंने इसका काफी और विस्तार भी दिया। उन्होंने बताया कि अपराधियों ने ओएनजीसी के अधिकारियों से रंगदारी मांगने की बात स्वीकारी है। दोनों की पहचान रोशनलाल राणा और सुनील कुमार के रूप में की गयी है। रोशन लाल के परिवार का पता लगाया गया तो पता चला कि वह गणेश राणा का बेटा है। इसी तरह सुनील कुमार संतो प्रसाद का बेटा है। 
कार्तिक ने बताया कि नक्सलवाद को काबू में करने के लिए हमारा अभियान तेज़ हैं और पिछले कुछ माह में माओवादियों के इस अलग हुए गिरोह पीएलएफआई के कुल 15 नक्सलियों को पुलिस ने हजारीबाग में गिरफ्तार करने में सफलता पायी है। जिनमें उनका जोनल कमांडर नंद किशोर महतो भी शामिल है। ज़ाहिर है कि यह करवाई नक्सली संगठनों पर काफी बड़ा आघात है। फिर भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि इन 15 
प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI) के नाम पर ओएनजीसी प्रभा कंपनी के डीजीएम अमित सिंह एवं अन्य लोगों से लेवी मांगने वाले दो अपराधियों को केरेडारी व बड़कागांव पुलिस ने गिरफ्तार किया है।  थाना प्रभारी ललित कुमार ने बड़कागांव थाना में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह जानकारी दी। 
उन्होंने बताया कि वरिष्ठ पदाधिकारियों को मिली गुप्त सूचना के आधार पर बड़कागांव थाना में दर्ज केस संख्या 79/20 के अप्राथमिक अभियुक्त रोशन लाल (पिता गणेश राणा) एवं सुनील कुमार (पिता संतो प्रसाद) को गिरफ्तार किया गया है। दोनों ग्राम पतरा खुर्द के निवासी हैं।  इन्हें पतरा खुर्द से ही गिरफ्तार किया गया है। 
थाना प्रभारी ने बताया कि गिरफ्तार किये गये अपराधियों ने स्वीकार किया है कि इन्होंने ओएनजीसी प्रभा कंपनी के डीजीएम अमित कुमार सिंह एवं अन्य लोगों से लेवी वसूली है। दोनों ने यह भी माना है कि उग्रवादी संगठन पीएलएफआइ के दिनेश गोप एवं अवधेश जायसवाल ने बड़कागांव के उरीमारी, पतरातू व भुरकुंडा क्षेत्र में नंद किशोर महतो को एरिया कमांडर बनाया है। 
ये दोनों उसी के निर्देश पर कंपनियों से लेवी की वसूली करते थे। थाना प्रभारी ने बताया कि दोनों अपराधियों से दो मोबाइल फोन बरामद हुए हैं। इसका कॉल डिटेल भी पुलिस के हाथ लगा है। छापामारी दल का नेतृत्व केरेडारी के थाना प्रभारी बम बम सिंह ने की। 
इनका सहयोग बड़कागांव थाना के पुलिस अवर निरीक्षक बबलू कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक दीपक कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक अभय कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक दिलीप कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक अमित कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक उत्तम तिवारी एसआइटी हजारीबाग एवं सशत्र बल ने किया।  सुरक्षा बलों लिए बहुत बड़ी उपलब्धि भी है। 
इसी तरह पंजाब के गांव अचरवाल में इस बार भी 12 सितंबर को शहीद कामरेड अमर सिंह अचरवाल  की बरसी मनाई गई। वही कामरेड अमर सिंह अचरवाल एक ऐसा लोकप्रिय शख्स जिसका मानना था कि कभी भी स्कियोरिटी के लामलश्कर किसी को भी सुरक्षा नहीं दे सकते। व्यक्ति की नीतियां ही उसकी सुरक्षा करती हैं। कामरेड अचरवाल पंजाब की भूमि पर सक्रिय जन समर्थक योद्धाओं को एकजुट करने के प्रयासों में थे। उन्होंने बहुत  बदले लेकिन स्वर एक ही रहा। इसी बीच उनकी हत्या कर दी गयी। यह भी एक  लम्बी कहानी है जिसकी चर्चा फिर कभी सही। 
इस मौके पर कामरेड कंवलजीत सिंह खन्ना, कामरेड सुखदर्शन नत्त, कामरेड निर्भय ढुडीके, जसबीर नत्त, अवतार रसूलपुर, हरबंस कौर गौंसला, बी की यू (एकता-डकौंदा)नेता महिंद्र सिंह कमालपुरा इत्यादि कई सक्रिय नेताओं ने सम्बोधित किया। इस प्रकार इस तरह के आयोजन पंजाब में इस आंदोलन  फिर से तैयार कर रहे हैं।  लोग बहुत ही उत्साह और जोश के  साथ ऐसे आयोजनों में आते हैं।  
वास्तव में कामरेड अमर सिंह अचरवाल वाम नक्सली सियासत में एक ऐसा रणनीतिकार भी था जिसके सुझाव, और विचार  होने वाले फैसलों पर असर डालते थे। इसलिए कंर्फ्ड अचरवाल को पंजाब की सियासत से हटाने वाले लोग कौन होंगें शायद इसे समझना ज़रा भी मुश्किल न लगे चाहे उन हत्यारों के नाम और रूप कोई भी क्यूं न हों। एक ऐसा व्यक्ति हमसे छीन गया जिसे किसी सरकार की सुरक्षा पर नहीं बल्कि अपने लोगों की सुरक्षा पर भरोसा था। इस विश्वास को तोड़ने का प्रयास बहुत पहले भी होता रहा है। सरकारी सुरक्षा लेने की गुहार लगाने   खड़ा वह व्यक्ति आज भी अपने विचारों के ज़रिये इसी रहस्य को समझाने के लिए उत्सुक है। गोलिया चला कर उसका जिस्म तो दुनिया से हटा दिया गया लेकिन उसके विचार आज भी जगमगा रहे हैं। 

Monday, April 27, 2020

नक्सली आन्दोलन पर हरभगवान की तीसरी पंजाबी पुस्तक

 पुस्तक चर्चा//गाथा इक सूरमे दी//सुखदर्शन नत  
मानसा//लुधियाना: 16 मई 2020: (पीपुल्ज़ मीडिया लिंक)::
पंजाब के नक्सलवादी आन्दोलन में से उभर कर सामने आये लोकप्रिय जनतक और राजनैतिक नेतायों की पहली पंक्ति में अआने वाले कामरेड बलदेव सिंह मान को शहीद हुए तकरीबन 34 वर्ष गुजर चुके हैं। इतनी लम्बी अवधि के बाद  उनके जीवन पर किसी पुस्तक का छपना स्वयं में ही इस बात का सबूत है कि न केवल वह क्रन्तिकारी आदर्श, जिनके लिए संघर्ष करते हुए कामरेड बलदेव मान ने अपनी जान कुर्बान की थी, आज भी समाज में उसी तरह प्रासंगिक हैं, बल्कि मान के साथी और वारिस अभी भी उसी शिद्दत, लगन और हिम्मत से उस संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं। 
इस पुस्तक के सम्बन्ध में विशेष बात यह भी है कि पुस्तक का सम्पादक कामरेड हरभगवान भीखी, बलदेव मान का समकाली नहीं है, बल्कि मान की शहादत के समय उसकी उम्र केवल 11 वर्ष की थी। वह कोई अकादमिक खोजकर्ता या इतिहासकार भी नहीं है न ही उसका कामरेड मान के कार्यक्षेत्र अमृतसर के साथ या उनके राजनीतिक दल के साथ कोई भी संगठनात्मक सम्बन्ध रहा। हरभगवान तो पंजाब के दक्षिण की तरफ सहित मानसा ज़िले में जन्म और पला बढ़ा। वह  जीवन से सीपीआई (एम एल) लिबरेशन का पूर्णकालिक सक्रिय कार्यकर्ता है। उसकी कर्मभूमि भी अब तह मालवा क्षेत्र ही रहा। पुस्तक प्रकाशित करने जैसे जिस कार्य की अपेक्षा कामरेड मान के नज़दीकी साथियों या सियासी हमसफरों से की जाती थी वह कार्य हरभगवान ने समय, सम्पर्कों गंभीर वित्तीय संकटों के बावजूद कामरेड मान के कार्यक्षेत्र से ढाई सो किलोमीटर दूर रहने के बावजूद पूरा कर दिखाया। आप इसे पंजाबी में पढ़ सकते हैं -नक्सलबाड़ी-में बस यहां क्लिक करके 
इसे क्रन्तिकारी आंदोलन से बिछुड़ चुके नेताओं और शहीदों के प्रति उसकी जनून जैसी लगन ही कहा जा सकता है और इसी वजह से वह इस बेहद कठिन और बुरी तरह पिछड़ चुके महत्वपूर्ण कार्य को पूरा कर दिखने में सफल रहा। परिणाम स्वरूप शहीद मान की स्मृति में यह पुस्तक आपके हाथों में पहुंच सकी। इससे पहले वह इंकलाबी लहर की जानीपहचानी महिला नेता (स्वर्गीय) कामरेड जीता कौर और राज्य के प्रथम पंक्ति के नक्सली शहीद कामरेड अम्र सिंह अच्चरवाल से सबंधित दो पुस्तकों को भी जनता तक पहुंचा चुका है। कामरेड मान से सबंधित यह पुस्तक हरभगवान की तीसरी ऐसी खोज पूर्ण पुस्तक है जो नक्सली आंदोलन को समर्पित है।
 ूँ बलदेव मान से सबंधित पुस्तक सम्पादित करने का प्रयास कोई पहली कोशिश नहीं है। हरभगवान की तरफ से यह प्रोजेक्ट हाथ में लेने से  करीब दस वर्ष पूर्व पंजाबी के जानेपहचाने कहानीकार अजमेर सिद्धु ने भी  नक्सलवादी आंदोलन पर पुस्तक तैयार करने का प्रयास बहुत ही जोशो खरोश और उत्साह के साथ साथ क्रन्तिकारी भावना को लेकर ही शुरू किया था।  उन्होंने बहुत सी समग्री संकलित भी कर ली थी लेकिन लहर में मौजूद शक्की स्वभाव और संकीर्ण सोच के हंद लोगों के असहयोग और बेतुके किंतु परंतु वाले सिलसिले ने उसे इतना परेशान कर दिया की उसने जहां  से यह प्रोजेक्ट शुरू किया था उसे वहीँ पर समाप्त कर दिया। इस सब के बावजूद इसे अजमेर सिद्धु की खुलदिली ही कहना चाहिए कि जब हरभगवान ने इस प्रोजेक्ट को हाथ में ले कर अजमेर सिद्धु से सम्पर्क किया तो उन्होंने सारी की सारी सामग्री हरभगवान के हवाले कर दी। इसके साथ ही हर सम्भव सहयोग का भी वायदा किया। इस तरह मैं गवाह हूं कि कामरेड मान के परिवार, रिश्तेदारों, नज़दीकी दोस्तों-मित्रों-संग्रामी साथियों और डाक्टर अवतार सिंह ओठी ने भी इस पुस्तक के लिए बहुत सहयोग दिया। उनके पास कामरेड की यादों की जो भी भी पूंजी जिस जिस रूप में भी थी उसे हरभगवान के हवाले कर दिया। इनमें शहीद मान की रचनाएं भी थीं।
इस पर भी इस किताब की समुचित सामग्री कोका अधीन करते हुए मुझे अहसास हुआ कि पंजाब के नक्सली धड़ों के ज़्यादातर नेता लहर के इतिहास,  इसमें समय समय पर उठने वाली बहसों के संबंध में खुल कर बात करने, अपनी यादों के कड़वे मीठे अनुभवों पर लिखने या मांग करने पर भी ऐसा रचनात्मक सहयोग देने के मामले में बहुत ही कंजूस या "शरमाकल" स्वभाव के हैं। वे नई समाजिक सियासी हालतों के नज़रिये से भी अतीत को फिर से देखने, जांचने और परखने की बात पर कोई उत्साह नहीं दिखाते। 
यह सब किसी जीवित और आगे बढ़ने के इच्छा रखने वाली इंक़लाबी लहर के लिए कोई शुभ लक्षण नहीं हैं। 
नेताओं की तरफ से नया लिखने या घटनाओं और घटनक्रमों का नए सिरे से विश्लेषण करने के मामले में उदासीन होने का ही परिणाम है कि इस पुस्तक के लिए सामग्री संग्रहित करने के लिए सम्पादक को उन्हीं रचनाओं का सहारा लेना पड़ा जो कामरेड मान की शहादत के बाद विभिन्न क्रन्तिकारी पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। मांग करने के बावजूद एक दो को छोड़ कर किसी ने (जिनमें मैं खुद ही शामिल हूँ) भी पुस्तक  अपना ताज़ा लेख/संस्मरण नहीं लिखा।  
इसी लिए पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक महसूस करेंगे कि इस पुस्तक में कामरेड मान के हंसी मज़ाक वाले स्वभाव, इंकलाबी लगन, निडरता, बेपरवाही, लोकप्रियता और सफलता पूर्वक लड़े गए जन आंदोलनों का ज़िक्र और ऐसे कई तरह के लिश्कारे तो कई जगहों पर नज़र आते हैं लेकिन उस दौर और उसके बाद समाजिक व सियासी हालात में आई तब्दीलियों का विवरण और इन तव्दीलियों के पीछे कार्यशील शक्तियों व कारणों का कहीं भी सटीक विश्लेषण कहीं नज़र ही नहीं आता। 
नई पीढ़ी के सूझवान पाठकों के मनों में जिज्ञासा होगी की आनंदपुर साहिब का प्रस्ताव क्या था? कैसे पंजाब के साथ धक्के की बात करने वाला, राज्यों को अधिक अधिकारों और फैडरल ढांचे को कायम करने जैसी लोकतान्त्रिक मांगों पर बहुत बड़ा सियासी आंदोलन खड़ा करने वाला, पंजाब के दरियाई पानियों के अनुचित बटवारे के खिलाफ बोलने और मार्कसी पार्टी के साथ मिल कर एस वाई एल नहर की खुदाई के खिलाफ कपूरी गांव में मोर्चा लगाने वाला अकाली दाल अचानक "धर्म युद्ध" की तरफ कैसे फिसल गया? आपरेशन नीला तारा जैसे कहर भरे और अमानवीय कुकृत्य और इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद नवंबर-1984 में देश भर में दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर राजीव गांधी हकूमत की तरफ से करवाए गए सिखों के भयानक हत्याकांड से महज़ 8 महीने बाद ही अकाली दल का  प्रधान संत हरचंद सिंह लोंगोवाल 24 जुलाई 1985 को उसी राजीव गाँधी के साथ बैठने और "राजीव लोंगोवाल समझौते" के नाम से जाने जाते पूरी तरह निक्क्मे और पंजाब विरोधी समझौते पर हस्ताक्षर करने को क्यों और कैसे मान गया? इतिहास में एक जुझारू पार्टी के तौर पर उभरा अकाली दल धीरे धीरे मोदी की साम्प्रदायिक और तानाशाह केंद्रीय सत्ता का बहुत ही वफादार सहयोगी कैसे बन गया? खालिस्तानी उभार के ज़बरदस्त उभार और शर्मनाक पतन के क्या कारण थे?पंजाब समस्या पर वाम के अलग अलग धड़ों/दलों की समझ और पहुंच क्या थी?इत्यादि बहुत से सवाल हैं जिन पर यह पुस्तक चर्चा  करती नज़र नहीं आती। 
ऐसी किसी भी पुस्तक के लेखक या सम्पादक के रास्ते में आने वाली एक निश्चित समस्या यह है कि क्रन्तिकारी लहर और इसके अलग अलग सियासी या जन संगठनों से सबंधित पांडुलिपियां, रचनाएँ, प्रकाशित सामग्री, दस्तावेज़ों ा यहाँ तक कि उनकी पत्र पत्रिकाएं की फाईलों की सही संभाल और बाकायदा रेकार्ड रखने के मामले में हालत कोई ज़्यादा अच्छी नहीं है। यही कारण है कि ज़रूरत की छपी हुई सामग्री या तो ढूंढे भी नहीं मिलती और या फिर  "गुप्त रेकार्ड" के नाम पर इंकार कर दिया जाता है। ऐसी हालत में लेखक के पास बस यही उम्मीद बची है कि जिस शहीद पर पुस्तक लिखनी है उसका कोई साथी मिल जाये को व्यक्तिगत रुचि के चलते कोई रेकार्ड या समाग्री संभाल कर बैठा हो। साथ ही यह भी आवश्यक है कि वह खज़ाना लेखक/सम्पादक के साथ सांझा भी करने को तैयार हो। आप समझ सकते है ऐसा सब कुछ कोई लाटरी लगने जैसा ही होता है जिसकी कोई भी गारंटी नहीं होती। 
इन सभी समस्यायों को आपके साथ बांटने का मकसद यही है कि यदि इन सभी दिक्क्तों के बावजूद कामरेड मान की शहादत के साढ़े तीन दश्कों के बाद भी हरभगवान इस पुटक की सामग्री एकत्र करके उसे छपवा लेता है तो यह किसी बहुत बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। विशेष तौर पर ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार पर कामरेड मान का लेख एक ऐसी वशिष्ठ रचना है जो साबित करती है कि इस हमले पर कामरेड मान और इंकलाबीयों की सोच और पहुंच सीपीआई/सीपीएम मार्का वाम दलों से पूरी तरह अलग थी, जो खालिस्तानी आतंकवाद के विरोध और "देश की एकता अखंडता की रक्षा" की आड़ में इन समस्यायों को पैदा करने वाली केंद्रीय सत्ता के पीछे जा कर खड़ी हो गईं थीं।  
मैं समझता हूं कि यह प्रेरणामय पुस्तक केवल कामरेड बलदेव सिंह मान को बनती हुई उचित श्रद्धांजलि ही नहीं बल्कि अलग अलग इंकलाबी नेताओं और शहीदों पर लिखी जाने वाली ऐसी पुस्तकों में अनजाने ही ऐसे बहुत घटनाक्रम, तारीखें, नाम-जगह, और व्यक्तियों के हवाले सुरक्षित हो जाते हैं  जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के इतिहासकारों के लिए बहुत ही लाभप्रद्ध और सटीक हवाला स्रोत बनना होता है। मैं आशा करता हूँ की साथी हरभगवान भविष्य में लेखन के क्षेत्र में और भी अधिक गंभीरता और मेहनत के साथ कार्य करेगा।
                                                                         (पंजाबी से अनुवाद-हिंदी स्क्रीन डेस्क) 
मानसा: 27 अक्टूबर 2019 
सुखदर्शन नत्त 
(केंद्रीय कमेटी सदस्य)
सीपीआई (एम एल लिबरेशन)
मोबाईल नंबर: +91 94172-33404
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