Friday, November 12, 2021

एक करोड़ रुपयों के ईनाम वाले किशन दा गरिफ्तार

जंगलों में रह कर भी संचालित करते रहे माओवादी अभियान 

सारंडा वन जहां किशन दा कई बार अज्ञातवास में रहे 
रांची: 12 नवंबर 2021: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

रांची से आ रही है बहुत बड़ी खबर। सुरक्षा बलों का हाथ नक्सली अभियान पर भरी बना हुआ है। एक शीर्ष नेता प्रशांत किशोर उर्फ़ किशन दा को उनकी पत्नी सहित गरिफ्तार कर लिया गया है। उनके दो और साथी भी ग्रिफ्तार किए गए हैं। इस तरह कुल चार लोग ग्रिफ्तार किए गए। प्रशांत बोस उर्फ़ किशन दा के कई और नाम भी थे। उन्हें ग्रिफ्तार करने की सक्रिय कोशिश चार दशकों से चल रही थी। पांच राज्यों की पुलिस उनके पीछे थी। 

माओवाद के खिलाफ दिनरात एक करके अभियान चला रहे सुरक्षा बलों को उस समय बहुत बड़ी सफलता मिली जब उन्होंने एक करोड़ रुपयों के इनाम वाले शीर्ष नक्सलवादी नेता को गरिफ्तार कर लिया। भाकपा माओवादियों के शीर्ष पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रशांत बोस उर्फ किशन दा, उनकी पत्नी शीला मरांडी समेत चार माओवादियों को झारखंड पुलिस ने शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया। प्रशांत बोस माओवादियों के ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो का सचिव भी हैं। वहीं प्रशांत बोस की पत्नी शीला मरांडी भी माओवादियों की शीर्ष सेंट्रल कमेटी की सदस्य है। वह माओवादियों के फ्रंटल आर्गेनाइजेशन नारी मुक्ति संघ की प्रमुख भी है। बहुत से स्थानों पर पार्टी को खड़ा करने में बोस की भूमिका बहुत ही उल्लेखनीय रही। सरकारी नज़र से इस इनामी नक्सलवादी लीडर की अहमियत इसी बात से पता चल जाती है कि प्रशांत बोस पर झारखंड में 70 से अधिक माओवादी कांड दर्ज है।

प्रशांत को गरिफ्तार किए जाने का विस्तृत विवरण भी बहुत दिलचस्प है। झारखंड पुलिस के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी ने प्रशांत बोस समेत अन्य के गिरिडीह के पारसनाथ से सरायकेला लौटने की जानकारी दी थी। इसके बाद सरायकेला पुलिस ने एक स्कार्पियो गाड़ी से प्रशांत बोस, शीला मरांडी, प्रशांत बोस के प्राटेक्शन दस्ता के एक सदस्य व कुरियर का काम करने वाले एक युवक को मुंडरी टोलनाका के पास से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद चारों माओवादियों को गुप्त स्थान पर रखकर पूछताछ की जा रही है। झारखंड पुलिस ने प्रशांत बोस पर एक करोड़ का ईनाम रखा हुआ है। इनाम की इतनी बड़ी राशि से ही पता चल जाता है कि पुलिस और अन्य सुरक्षा बल इसकी गरिफ्तारी के लिए कितने परेशान रहे होंगें। गौरतलब है कि प्रशांत बोस पर झारखंड में 70 से अधिक माओवादी कांड दर्ज है। शायद अन्य राज्यों की सरगर्मियां मिला कर यह लिस्ट और भी  लम्बी हो जाए।  

लम्बे समय से बीमारी का भी है प्रकोप कोलकाता जाकर करवाता था इलाजअज्ञातवास का जीवन आसान तो नहीं होता। इसके साथ ही उम्र भी काफी है। बहुत सी कठिनाइयां होती हैं इस सब से। छोटीमोटी कई बीमारियां लग जाती हैं जिनका इलाज आवश्यक हो जाता है। पूछताछ में पुलिस को जानकारी मिली है कि प्रशांत बोस की तबीयत बीते कई सालों से खराब थी। लेकिन इसके बावजूद वह लगातार अपने इस संगठन में सक्रिय रहा जिसके लिए वह हमेशां प्रतिबद्ध रहा। जानकारी के मुताबिक प्रशांत दा कोल्हान से पारसनाथ जाकर रह रहा था। पारसनाथ से ही वह प्रोटेक्शन दस्ता के सदस्यों के द्वारा एनएच 2 तक लाया जाता था। इसके बाद कुरियर के द्वारा ही प्रशांत बोस को कोलकाता ले जाया जाता था। हाल ही में प्रशांत बोस कोलकाता से लौटा था। इस तरह इलाज के लिए आने जाने के लिए भी सफर की जो प्रक्रिया अपने जाती वह कम दिलचस्प नहीं है। हर कदम पर सावधानी और सनसनी एक साथ चलते। माओवादी संगठन में इतने बड़े पद पर आसीन प्रशांत दा के लिए इतनी वशिष्ट किस्म की सुरक्षा व्यवस्था स्वाभाविक ही थी। उसका पद बेहद महत्वपूर्ण पद है। 

माओवादी संगठन एमसीसीआई का प्रमुख था प्रशांत बोस

माओवादी विचारधारा को समर्पित संगठनों में पद और ज़िम्मेदारी दोनों बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। माओवादी संगठनों में से कोई अज्ञातवास में चल रहा हो या खुले तौर पर सक्रिय हो दोनों ही तरह के संगठनों में पद, जिम्म्मेदारी और प्रस्ताव लागू करना अहम रहता है। जितना बड़ा पद उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी। प्रशांत बोस के पास ईआरबी के सचिव के तौर पर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के झारखंड के सीमावर्ती इलाके, असम समेत पूर्वोतर के राज्यों का प्रभार था। साल 2004 में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर आफ इंडिया (एमसीसीआई) और पीपुल्ज़ वार ग्रुप (पीडब्लूजी) के विलय के पूर्व वह एमसीसीआई का प्रमुख था। विलय के बाद भाकपा माओवादी संगठन में कोटेश्वर राव को प्रमुख बनाया गया था, जबकि बतौर ईआरबी सचिव तब से प्रशांत बोस संगठन में सेकेंड इन कमान था। झारखंड में पारसनाथ, सारंडा, ओड़िसा और बंगाल के सीमावर्ती इलाके में प्रशांत बोस ने ही संगठन को खड़ा किया था। प्रशांत बोस मूलत: पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के यादवपुर का रहने वाला है। पश्चिम बंगाल की पृष्ठभूमि होने के कारण सख्तियों भरी ज़िंदगी जीने के भी आदी बन गए थे प्रशांत दा। 

वृद्धावस्था में संभाले बैठे थे अनुभवों का खज़ाना 

नक्सलवाद और माओवाद के रास्ते पर चलते चलते हुए प्रशांत दा की उम्र तो बढ़ गई लेकिन साथ ही बढ़ गया अनुभवों का खज़ाना। थ्यूरी के साथ साथ प्रेक्टिस में भी बहुत से नए अनुभव मिले। इन नए अनुभवों से थ्यूरी और तीखी होती चली गई। विचारधारा के आधार की ज़मीन और परमार्जित होती रही। इन्हीं अनुभवों के चलते संगठन के नए यूनिट खड़े करने और मौजूदा यूनिटों को मज़बूत करने में उनको महारत हासल है। स्थानीय राजनीति, स्थानीय समस्याओं और स्थानीय हालात व् पर्यावरण के चलते इन अनुभवों से बहुत ही सहायता मिलती है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही नक्सली संगठन अपने नए एक्शन प्लान तैयार करते हैं। 

अज्ञातवास के जीवन में भी बहुत एक्सपर्ट भी रहे 

प्रशांत बोस उर्फ़ किशन दा अज्ञातवास की ज़िंदगी के बहुत ही अभ्यस्त रहे और इसमें निपुण भी हो गए ,जल्दी किए उनकी सरगर्मियां किसी की नज़र में न न आतीं। करीब पांच वर्ष पूर्व तो स्थिति यह बन गई थी उनके ज़िंदा होने का भी सरकार को कुछ पक्का पता नहीं था। उन दिनों उनके ही निकट एक सहयोगी को बयान देना पड़ा कि किशन दा ज़िंदा हैं और कमान उनके हाथ में है। ये भी खबर थी कि किशन दा जीवित नहीं है। मगर 25 लाख के इनामी नक्सली कमांडर कान्हू मुंडा ने खुलासा किया था कि किशन दा जिंदा हैं। वही नक्सलवाद की कमान संभाले हुए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह वे बंगाल के जंगलों में नहीं, झारखंड के सारंडा जंगल से नक्सल गतिविधियां चला रहे हैं। झारखंड सरकार ने उस पर एक करोड़ का इनाम रखा है।

 किशन दा सारंडा सहित कई जगहों पर शरण लेते रहे

पांच सात वर्ष पूर्व के उस दौर में भी किशन दा पर ओड़िशा, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र सरकार ने भी इनाम घोषित कर रखा है।  किशन दा ने असीम मंडल उर्फ आकाश को कोल्हान समेत पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में संगठन मजबूत करने की जिम्मेवारी सौंपी है। उन दिनों में भी प्रशांत उर्फ़ किशन दा सारंडा सहित कई जगहों पर शरण लेते रहे। झारखंड  सारंडा के जंगल बहुत गहन जंगल हैं। सारंडा वन झारखंड-ओडिशा सीमा में फैला हुआ है, और यहाँ बड़ी संख्या में पशु, पक्षी और सरीसृप प्रजातियां पाई जाती हैं। 'सारंडा' शब्द का अर्थ है हाथियों और वन को इसका नाम बड़ी संख्या में यहाँ रहने वाले हाथियों के कारण मिलता है। जंगल दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है, जहां लुप्तप्राय उड़ने वाली छिपकली रहती है। इस तरह यह एक महत्वपूर्ण स्थान है जो सैलानी स्थल ही है। सैलानी स्थल होने के कारण यहां अज्ञातवास के बावजूद जनसाधारण में से सिलेक्टिड लोगों से राब्ता बनाना आसान हो जाता है। 


Sunday, September 26, 2021

नई दिल्ली में वामपंथी उग्रवाद पर समीक्षा बैठक

प्रविष्टि तिथि: 26 SEP 2021 4:10 PM by PIB Delhi

 केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने  की अध्यक्षता 


नई दिल्ली
26 सितंबर 2021: (पीआईबी//नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

नक्सलवाद से प्रभावित राज्यों की समीक्षा के लिए एक विशेष बैठक गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई। जिसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। विच्जविमर्श में कई बातें उभर कर सामने आईं। जो तथ्य और नुक्ते इस समीक्षा में सामने आए उनका संक्षिप्त रूप हम सबसे पहले दे रहे हैं। 

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए कटिबद्ध है

*प्रधानमंत्री की अगुवाई में वामपंथी उग्रवाद पर नकेल कसने में मिल रही है सफलता 

*केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों से लगातार कामयाबी मिल रही है 

*दशकों की लड़ाई में हम ऐसे मुकाम पर पहुंचे हैं जहाँ सफलता निकट है 

*पहली बार मृत्यु की संख्या 200 से कम है और यह बहुत बड़ी उपलब्धि है

*जब तक हम वामपंथी उग्रवाद की समस्या से पूरी तरह निजात नहीं पाते तब तक देश का और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों का पूर्ण विकास संभव नहीं

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तैनाती पर होने वाले राज्यों के स्थायी ख़र्च में कमी लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है

*इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2018-19 के मुक़ाबले 2019-20 में CAPFs की तैनाती पर होने वाले राज्यों के ख़र्च में लगभग 2900 करोड़ रूपए की कमी आई है

*भारत सरकार कई सालों से राजनीतिक दलों पर ध्यान दिये बिना दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ती रही है, जो हथियार छोड़कर लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं उनका दिल से स्वागत है लेकिन जो हथियार उठाकर निर्दोष लोगों और पुलिस को आहत करेंगे, उनको उसी तरह जवाब दिया जायेगा

*असंतोष का मूल कारण आज़ादी के बाद 6 दशकों में विकास ना पहुंच पाना है, लेकिन अब प्रधानमंत्री जी की अगुवाई में विकास हो रहा है और नक्सली भी ये बात समझ चुके हैं कि विकास होने पर निर्दोष लोग उनके बहकावे में नहीं आएंगे इसीलिए विकास की गति निर्बाध रूप से जारी रखना बहुत ज़रूरी है

*जिस समस्या के कारण पिछले 40 वर्षों में 16 हज़ार से अधिक नागरिकों की जान गई हैं, उसके ख़िलाफ़ लड़ाई अब अंत तक पहुंची है और इसकी गति बढ़ाने और इसे निर्णायक बनाने की ज़रूरत है

*हाल ही में भारत सरकार ने अनेक उग्रवादी गुटों, विशेषकर उत्तरपूर्व में, के साथ समझौता कर उनसे हथियार डलवाने में सफलता हासिल की है

*वामपंथी उग्रवादियों के आय के स्रोतों को निष्प्रभावी करना बेहद ज़रूरी है

अब चर्चा विस्तार से:

भारत सरकार वाम उग्रवाद को समाप्त करने में लगातार सक्रिय है। जंग और नीति दोनों पर ध्यान दिया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री, श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में वामपंथी उग्रवाद पर एक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में केन्द्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री, श्री गिरिराज सिंह, जनजातीय मामलों के मंत्री श्री अर्जुन मुंडा, दूरसंचार, सूचना-प्रौद्योगिकी और रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव, सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय भी उपस्थित थे। 

बैठक में बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और झारखंड के मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश की गृह मंत्री, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और केरल के वरिष्ठ अधिकारी, केन्द्रीय गृह सचिव, केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के शीर्ष अधिकारी और केन्द्र तथा राज्य सरकार के अनेक वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए कटिबद्ध है। उन्होंने कहा कि यह आनंद का विषय है कि प्रधानमंत्री जी की अगुवाई में वामपंथी उग्रवाद पर नकेल कसने में केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों से बहुत सफलता मिली है। श्री शाह ने कहा कि एक तरफ जहां वामपंथी उग्रवाद की घटनाओं में 23 प्रतिशत की कमी आई है वहीं मौतों की संख्या में 21 प्रतिशत की कमी आई है। श्री अमित शाह ने कहा कि दशकों की लड़ाई में हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे हैं जिसमें पहली बार मृत्यु की संख्या 200 से कम है और यह हम सबकी साझा और बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि हम सब जानते हैं कि जब तक हम वामपंथी उग्रवाद की समस्या से पूरी तरह निजात नहीं पाते तब तक देश का और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों का पूर्ण विकास संभव नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इसको खत्म किए बिना न तो लोकतन्त्र को नीचे तक प्रसारित कर पाएंगे और न ही अविकसित क्षेत्रों का विकास कर पाएंगे, इसलिए हमने अब तक जो हासिल किया है उस पर संतोष करने की बजाय जो बाकी है उसे प्राप्त करने के लिए गति बढ़ाने की जरूरत है।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत सरकार कई सालों से राजनीतिक दलों पर ध्यान दिये बिना दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ती रही है। श्री शाह ने कहा कि जो हथियार छोड़कर लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहते हैं उनका दिल से स्वागत है लेकिन जो हथियार उठाकर निर्दोष लोगों और पुलिस को आहत करेंगे, उनको उसी तरह जवाब दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि असंतोष का मूल कारण है आज़ादी के बाद पिछले 6 दशकों में विकास ना पहुंच पाना, इससे निपटने के लिए वहां तेज़ गति से विकास पहुंचाना और आम जनता और निर्दोष लोग उनके साथ ना जुड़ें, ऐसी व्यवस्था करना अति आवश्यक है। श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में विकास हो रहा है और अब नक्सली भी ये बात समझ चुके हैं कि विकास होने पर निर्दोष लोग उनके बहकावे में नहीं आएंगे इसीलिए विकास की गति निर्बाध रूप से जारी रखना बहुत ज़रूरी है। इन दोनों मोर्चों पर सफल होने के लिए ये बैठक बहुत मह्त्वपूर्ण है। उन्होंने राज्यों से आग्रह किया कि वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए प्रभावित राज्यों के मुख्य सचिव कम से कम हर तीन महीने में पुलिस महानिदेशक और केन्द्रीय ऐजेंसियों के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करें, तभी हम इस लड़ाई को आगे बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो साल में जिन क्षेत्रों में सुरक्षा पहुंच नहीं थी, वहां सुरक्षा कैंप बढ़ाने का काफी बड़ा और सफल प्रयास किया गया है, विशेषकर छत्तीसगढ़ में, साथ ही महाराष्ट्र और ओडिशा में भी सुरक्षा कैंप बढ़ाए गए हैं। श्री शाह ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के स्तर पर नियमित समीक्षा की जाती है, तो निचले स्तर पर समन्वय की समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। श्री अमित शाह ने कहा कि जिस समस्या के कारण पिछले 40 वर्षों में 16 हज़ार से अधिक नागरिकों की जान गई हैं, उसके ख़िलाफ़ लड़ाई अब अंत तक पहुंची है और इसकी गति बढ़ाने और इसे निर्णायक बनाने की ज़रूरत है।

श्री अमित शाह ने कहा कि हाल ही में भारत सरकार ने अनेक उग्रवादी गुटों, विशेषकर उत्तरपूर्व में, के साथ समझौता कर उनसे हथियार डलवाने में सफलता हासिल की है। बोड़ोलैंड समझौता, ब्रू समझौता, कार्बी आंगलोंग समझौता और त्रिपुरा के उग्रवादियों द्वारा आत्मसमर्पण समेत अबतक लगभग 16 हज़ार कैडर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि जितने भी लोग हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहते हैं, उनका हम स्वागत करते हैं।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि राज्य प्रशासन को सक्रिय होकर केन्द्रीय बलों के साथ तालमेल के साथ आगे बढ़ना चाहिए। श्री अमित शाह ने कहा कि केन्द्रीय बलों के बारे में जिन राज्यों ने मांग भेजी हैं, उन्हें पूरा करने का प्रयास किया गया है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तैनाती पर होने वाले राज्यों के स्थायी ख़र्च में कमी लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2018-19 के मुक़ाबले 2019-20 में CAPFs की तैनाती पर होने वाले राज्यों के ख़र्च में लगभग 2900 करोड़ रूपए की कमी आई है। प्रधानमंत्री ने निरंतर इसकी समीक्षा की है और लगातार हम सबका मार्गदर्शन कर रहे हैं।

श्री अमित शाह ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों के आय के स्रोतों को निष्प्रभावी करना बेहद ज़रूरी है। केन्द्र और राज्य सरकारों की ऐजेंसियों को मिलकर एक व्यवस्था बनाकर इसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह करते हुए कहा कि वे वामपंथी उग्रवाद की समस्या को अगले एक साल तक प्राथमिकता दें, जिससे इस समस्या का स्थायी समाधान हो सके। उन्होंने कहा कि इसके लिए दबाव बनाने, गति बढ़ाने और बेहतर समन्वय की ज़रूरत है।

वामपंथी उग्रवाद पिछले कई दशकों से एक अहम सुरक्षा चुनौती रहा है। हालांकि यह मुख्य रूप से राज्य का विषय है लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने वामपंथी उग्रवाद के ख़तरे से समग्र रूप से निपटने के लिए 2015 से एक ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' बनाई है। इस योजना की प्रगति और स्थिति की लगातार सघन निगरानी की जा रही है और यह एक बहुआयामी दृष्टिकोण वाली नीति है।

प्रभावित क्षेत्रों में ग़रीब और कमज़ोर वर्ग तक विकास पहुंचाने के लिए विकासशील गतिविधियों पर अधिक ज़ोर देने के साथ ही हिंसा के प्रति शून्य सहिष्णुता, वामपंथी उग्रवाद के ख़तरे से निपटने की ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

इस नीति के अंतर्गत, केन्द्रीय गृह मंत्रालय, सीएपीएफ बटालियनों की तैनाती, हेलीकॉप्टरों और यूएवी के प्रावधान और भारतीय रिजर्व बटालियनों (आईआरबी) / विशेष भारत रिजर्व बटालियनों (एसआईआरबी) की मंजूरी के जरिए क्षमता निर्माण और सुरक्षा तंत्र की मज़बूती के लिए राज्य सरकारों को समर्थन दे रहा है। राज्य पुलिस के आधुनिकीकरण और प्रशिक्षण के लिए पुलिस बल के आधुनिकीकरण (एमपीएफ), सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजना और विशेष बुनियादी ढांचा योजना (एसआईएस) के तहत भी धनराशि उपलब्ध कराई जाती है।

वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों के विकास के लिए, भारत सरकार ने कई विकासात्मक पहल की हैं जिनमें 17,600 किलोमीटर सड़कों को मंज़ूरी शामिल है, जिसमें से 9,343 किलोमीटर सड़कों का निर्माण आरआरपी-I, आरसीपीएलडब्ल्यूई के तहत पूरा हो चुका है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों में दूरसंचार सुविधाओं में सुधार के लिए 2,343 नए मोबाइल टावर लगाए गए हैं और अगले 18 महीनों में 2,542 अतिरिक्त टावर लगाए जाएंगे। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों में लोगों के वित्तीय समावेशन के लिए 1,789 डाकघर, 1,236 बैंक शाखाएं, 1,077 एटीएम और 14,230 बैंकिंग प्रतिनिधि खोले गए हैं और अगले एक वर्ष में 3,114 डाकघर और खोले जाएंगे। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) खोलने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों के लिए कुल 234 ईएमआरएस स्वीकृत किए गए हैं, इनमें से 119 कार्यरत हैं।

सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों में विकास को और गति देने के लिए विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) योजना के तहत, 10,000 से अधिक परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें से 80% से अधिक पूरी हो चुकी हैं। इस योजना के तहत वामपंथी उग्रवाद प्रभावित राज्यों को 2,698.24 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। एसआईएस के तहत 992 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है और 152 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि जारी कर दी गई है। एसआरई के तहत अप्रैल, 2014 से पिछले 7 वर्षों में 1,992 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है, जो कि सात वर्षों से पहले की अवधि की तुलना में 85% अधिक है।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने कुछ ज़िलों को वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों के रूप में वर्गीकृत किया था और वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए प्रभावित राज्यों को विशिष्ट संसाधन जुटाने के लिए सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई) योजना के तहत कवर किया था। इन एसआरई जिलों में से, देश भर में वामपंथी उग्रवाद संबंधी हिंसा वाले ज़िलों में से 85% से अधिक जिलों को सुरक्षा और विकास से संबंधित संसाधनों की केन्द्रित उपलब्धता के लिए 'सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों' के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

पिछले एक दशक में, हिंसा के आंकड़ों और इसके भौगोलिक फैलाव, दोनों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। वामपंथी उग्रवाद संबंधित हिंसा की घटनाएं 2009 में 2,258 के उच्चतम स्तर से 70% कम होकर वर्ष 2020 में 665 रह गई हैं। मौतों की संख्या में भी 82% की कमी आई है जो वर्ष 2010 में दर्ज 1,005 के उच्चतम आंकड़े से घटकर वर्ष 2020 में 183 रह गई हैं। माओवादियों के प्रभाव वाले ज़िलों की संख्या भी वर्ष 2010 में 96 से वर्ष 2020 में घटकर सिर्फ 53 ज़िलों तक सीमित रह गई है। माओवादियों को अब सिर्फ़ कुछ ही इलाक़ों में 25 ज़िलों तक सीमित कर दिया गया है जो कि देश के कुल वामपंथी उग्रवाद की 85% हिंसा के लिए ज़िम्मेदार हैं।

बेहतर स्थिति के कारण, एसआरई जिलों की संख्या की पिछले तीन वर्षों में दो बार समीक्षा की गई, जो अप्रैल, 2018 में 126 ज़िलों से घटकर 90 और फिर जुलाई, 2021 में 70 हो गए। सबसे अधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित ज़िलों की संख्या भी अप्रैल, 2018 में 35 से घटकर 30 और फिर जुलाई, 2021 में इसे और कम करके 25 कर दिया गया।

वामपंथी उग्रवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई अब महत्वपूर्ण चरण में है और सरकार जल्द ही इस ख़तरे को बेहद कम करने के प्रति आशान्वित है।

वामपंथी आतंकवाद के भौगोलिक प्रसार में कमी की बात नोट की गई है। मीटिंग में जो तथ्य प्रस्तुत किए गए वे तथ्य इस कमी को ही दर्शाते हैं। 


इसी तरह वामपंथी उग्रवाद संबंधी घटनाएं भी लगातार कम होती जा रही हैं। सरकार इस दिशा में भी पूरी तरह से अग्रसर है। 


इस कमी के परिणामस्वरूप मौतें भी कम हो रही हैं। गौरतलब है की नक्सल अभियान में बहुत सी अनमोल जानें जा चुकी हैं। 


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एनडब्ल्यू  / आरके / एवाई / आरआर

Thursday, September 2, 2021

कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि कार्यक्रम 12 सितंबर को होगा

 2nd September 2021:04:29 PM

 जीवन भर वाम और बदलाव को समर्पित रहे कामरेड रामनाथ 

चंडीगढ़: 02 सितंबर 2021: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन ब्यूरो)::

वाम बार बार बंटा। बार बार टूटा। कई नए संगठन खड़े हुए। कई नए दल बने। बंट कर भी, अलग अलग हो कर भी ये लोग किसी न किसी रूप में इसी विचारधारा को मज़बूत बनाते रहे और आगे चलाते रहे। इस अभियान के लिए बहुत से लोग चुपचाप खामोशी से काम करते रहे। उनकी साधना बहुत लम्बी भी है और महत्वपूर्ण भी। बहुत सी कुर्बानियां हैं उनकी। इन्हीं में से एक थे कामरेड रामनाथ। 

भारत की कम्युनिस्ट लीग (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के संस्थापक कॉमरेड रामनाथ बीती 31 अगस्त को हमारे बीच नहीं रहे। उनकी उम्र अस्सी साल से ऊपर थी, वह लम्बे समय से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे और अब दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी याद में श्रद्धांजलि समागम 12 सितबंर को गुरशरन कला भवन, मुल्लांपुर में किया जा रहा। यह जानकारी मार्क्सवादी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर की और से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में दी गई। उन्होंने कहा है कि कॉमरेड रामनाथ का निधन भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन को न पूरी हो सकने वाली क्षति है।

*कॉमरेड सुखविंदर ने बताया कि कॉमरेड रामनाथ के जीवन का बड़ा हिस्सा (लगभग छः दशक) भारत की मेहनतकश जनता के मुक्ति संग्राम को समर्पित रहा। उनके क्रांतिकारी राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारत की कम्युनिस्ट पार्टी से हुई। 1964 में इस पार्टी में फूट पड़ने के बाद वे नई बनी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में शामिल हो गए। 1969 में भाकपा (मा.ले.) बनने के बाद राम नाथ इस पार्टी में शामिल हुए। 1978 में उनके नेतृत्व में भारत की कम्युनिस्ट लीग (मा.ले.) की स्थापना हुई। उन्होंने भारतीय समाज का गहराई से अध्ययन किया, नव-जनवादी क्रांति के कठमुल्लेपन को तोड़कर, समाजवादी क्रांति का कार्यक्रम दिया। उन्होंने कम्युनिस्ट आन्दोलन को आज़ादाना सोच की वैज्ञानिक हिम्मत दी। उन्होंने कहा कि कॉमरेड रामनाथ अपने पीछे एक समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं, जिसे आत्मसात करते हुए समाजवादी क्रांति की दिशा में जनांदोलन को आगे बढ़ाना हमारा कार्यभार है। उन्होंने कॉमरेड रामनाथ श्रद्धांजलि समागम में आन्दोलन के कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों को पहुँचने की अपील की है।

*कामरेड सुखविदंर प्रतिबद्ध के सम्पादक भी हैं और इस क्षेत्र के ज्ञान पर उनकी काफी पकड़ है।  

Sunday, December 13, 2020

ना संघर्ष ना तकलीफ, तो क्या मजा है जीने में

बड़े-बड़े तूफ़ान थम जाते है, जब आग लगी हो सीने में

 वाम से जुड़े लोग भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि अब पहले की तरह वाम का वह दबदबा नहीं रहा। आदर्शों  और सिद्धांतों को समर्पित सियासत गिरगिट की तरह तेज़ी से रंग बदलते उन हालात से सुर और ताल नहीं बिठा पाई जो विगत कुछ दशकों में उभर का सामने आए। सत्ता पर बैठने वालों ने इस मामले में मुहारत हासिल कर ली और सफल भी हुए। इस अप्रत्याशित सफलता के बावजूद उनके पास समर्पित लोग नहीं हैं जो आज भी वाम के पास हैं। इन्हीं लोगों में एक हैं कामरेड सुखदर्शन नत्त। अब जबकि वाम से जुड़े लोगों के परिवारिक सदस्य भी उनका साथ देते नज़र नहीं आते उस समय कामरेड सुखदर्शन नत्त पूरे परिवार सहित तन, मन और धन से वाम की राह पर समर्पित हैं और पूरे जोश के साथ इसी मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। सिर्फ चल ही नहीं रहे हैं बल्कि अन्य लोगों को चला भी रहे हैं। पंजाब के हालात से लेकर दिल्ली के बार्डरों पर लगे किसान मोर्चों तक। इस पूरे परिवार को देख कर एक बार फिर उम्मीद बंधती है कि वाम बहुत जल्द करिश्मा दिखाएगा। प्रस्तुत है एक आलेख की कुछ पंक्तिया जो उन्हें ले कर इंद्रेश मैखुरी ने शेयर की हैं। --रेक्टर कथूरिया 

जिन्हें किसान आंदोलन में खालिस्तान का हाथ नजर आ रहा है उन्हें रिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण का यह पोस्ट पढ़ना चाहिए जिसमें वे बता रहे हैं कि आज किसान आंदोलन के नेता एक समय में खालिस्तान के खिलाफ लड़ाई के भी नेता रहे हैं। 

जिउंदे वस्दे रहो साथी

यकीन नहीं होता, पूरे तीस साल हो गए, जब पहली बार मैंने पंजाब की यात्रा की थी। इसकी पहली मंजिल थी मानसा, जो तब भटिंडा जिले का एक उनींदा सा कस्बा भर था। और इस मंजिल तक मेरे गाइड थे सपन दा। खुशमिजाज ट्रेड यूनियन लीडर सपन मुखर्जी, जो पंजाबी जुबान ऐसे बोलते थे जैसे मां के पेट से सीखकर आए हों। दिल्ली से पच्छिम का इलाका तब मेरे लिए परदेस था। सच कहूं तो दिल्ली भी धीरे-धीरे परिचय के दायरे में आ रहे किसी आश्चर्यलोक जैसी ही थी। मेरी दुनिया तब लखनऊ-इलाहाबाद से आरा-पटना के बीच ही घूमती थी। पंजाब में मैं एक साप्ताहिक पत्रिका के लिए रिपोर्टिंग करने आया था लेकिन यहां रहने का न मेरा कोई समय तय था, न जगह। संपर्क निकालते हुए ज्यादा से ज्यादा घूमना था।

बाहर चर्चा थी कि खालिस्तान का हल्ला अब ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला, लेकिन बसों से खींचकर निर्दोष लोगों की हत्याएं तब भी हो रही थीं। आग दोबारा धधक उठने की बात तब भी कही जा रही थी। बीतते दिसंबर में दिन जाते यों भी देर नहीं लगती। ऊपर से माहौल ऐसा कि सूरज ढलते ही दुकानों के शटर और घरों के किवाड़ बंद हो जाते थे। इतना ही ध्यान है कि मानसा में जिन साथी के यहां हम रुके वहां रात में ज्यादा बात नहीं हो पाई। सुबह पता चला, लंबे-चौड़े लेकिन कसे हुए शरीर वाले उन साथी का नाम सुखदर्शन सिंह नट है और मानसा में पूरे परिवार के साथ सड़क पर उतर कर खालिस्तानियों के खिलाफ मोर्चा बांधने वाले वे अकेले ही हैं।

यह भी कि औपचारिक तौर पर वे एक सरकारी कर्मचारी हैं। सिंचाई विभाग में इंजीनियर। हालांकि उनके विभाग ने हाथ-पांव जोड़कर उन्हें महीने में सिर्फ एक दिन हाजिरी बनाने और पगार का चेक लेने के लिए दफ्तर आने को राजी कर लिया है। इस चमत्कार का कारण यह था कि नीचे से आने वाली विभागीय घूस में हिस्सा बंटाने और किसी भी इन्क्वायरी में झूठ बोलने से उन्होंने साफ मना कर दिया था। अलग तरह की एक्टिविस्ट लाइफ। उनकी पत्नी जसबीर कौर पर मेरा ध्यान तब उतना ही गया, जितना किसी अजनबी परिवार की गृहणी पर कुछ घंटों में जा सकता है। फिर वे मुझे आयोजनों में दिखने लगीं। जिम्मेदार, गंभीर और सदा मुस्कुराती हुई।

जैसे-जैसे मेरे जीवन की दिशा बदली, पति-पत्नी से मुलाकात के मौके कम होते गए। फेसबुक का दौर आया तो यहां मानसा के कई साथी मिले। सबकी अलग-अलग कहानियां। एक दिन फ्रेंड रिक्वेस्ट में नवकिरन नट नाम देखकर क्लिक किया। जबर्दस्त फेमिनिस्ट और मुद्दों पर लड़ मरने वाली लेफ्टिस्ट लड़की। पूछा तो पता चला, साथी सुखदर्शन और जसबीर की बेटी है। और अभी अचानक जानकारी मिली कि पूरा परिवार टीकरी बॉर्डर पर आंदोलन में डटा है। निजी तौर पर मेरे लिए सबसे अचरज की बात जसबीर कौर का टीकरी के मोर्चे पर समूचा प्रबंधन देखना है। 60 की उम्र में हमेशा की तरह जिम्मेदार, गंभीर और हर दबाव में मुस्कुराती हुई। संघर्ष का यह रसायनशास्त्र कितनी खामोशी से काम करता है! 

संघर्ष का यह रसायनशास्त्र अगर आपके आसपास भी सक्रिय हो तो इसकी जानकारी अवश्य प्रकाशनार्थ भेजिए। --सम्पादक   ईमेल है: medialink32@gmail.com

नक्सलबाड़ी  (पंजाबी) में  भी कामरेड सुखदर्शन नत्त पर विशेष  पोस्ट 

ਖੜੋਤ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਨਕਸਲਬਾੜੀ ਲਹਿਰ ਦੀ ਸੰਭਾਲ ਕਰਦੀ ਸ਼ਖ਼ਸੀਅਤ

Sunday, September 13, 2020

नक्सली रोशनलाल राणा और सुनील कुमार गिरफ्तार

 पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़े हैं दोनों 
 हजारीबाग:13 सितंबर 2020: (सोशल मीडिया//इंटरनेट//नक्सलबाड़ी स्क्रीन)::
मध्य भारत की नक्सली सरगर्मियों पर
पंजाबी पत्रिका सुर्ख रेखा का विशेषांक 
प्रतीकात्मक तस्वीर 
कोरोना का कहर बुरी तरह सामने आने के बावजूद नक्सली संगठनों की गतिविधियों में कोई रुकावट या धीमी गति जैसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। पंजाब से पंजाबी में छपती नक्सली पत्रिकाओं के मुताबिक नक्सली संगठन पूरे जोशो खरोश के साथ अपनी सरगर्मियां चला रहे हैं। साथ ही वे अपनी मीटिंगें भी कर रहे हैं और सम्मेलन भी आयोजित कर रहे हैं। इन पत्रिकायों से जुड़े सूत्रों  के मुताबिक नक्सली संगठन परम्परिक  मुकाबले अधिक काम कर रहे हैं।  पंजाबी की नक्सली पत्रिका "सुर्ख रेखा" ने अपने मार्च-अगस्त 2020 के अंक को इस बार विशेषांक के तौर पर प्रस्तुत किया है। इसमें चार पृष्ठों का रंगीन कवर है और बाकी 138 पृष्ठ अलग हैं। इस तरह कुल कुल-142 पृष्ठ की इस पत्रिका की कवर परे कीमत लिखी है 60/- रूपये।  इस विशेष अंक में इस बार भी क़ाफी कुछ है। कवर स्टोरी सीपीआई (माओवादी) के बस्तर सम्मेलन को बनाया गया है और इसकी तस्वीरें भी फ्रंट पेज पर प्रकशित की गयी हैं। पत्रिका के मुताबिक यह सम्मेलन कोरोना काल के नियमों और बंदिशों की धज्जियां उड़ाते हुए 18 से 20 जून 2020 तक हुआ। इस मौके पर आदिवासियों की  बस्तर में की गई नाकाबंदी की तस्वीर भी दिखाई गई है जिसमें प्रवेश वर्जित के बैनर लगे भी नज़र आते हैं। इस स्टोरी के ज़रिये यह कहने की कोशिश की गयी कि बस्तर में सीपीआई (माओवादी)की ही चलती है। इसी तरह के प्रचार से पंजाब में भी इस आंदोलन को फिर से खड़ा करने की कोशिशें नज़र आती हैं। 
इसी तरह सुरक्षा बलों की खबरें भी आ रही हैं। झारखंड के हजारीबाग में पुलिस के हाथ पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI) के दो नक्सलियों को पकड़ने में कामयाबी लगी है जो लगातार ऑयल एंड नेचुरल गैस कार्पोरेशन (ओएनजीसी) के अधिकारियों को रंगदारी देने के लिए लगातार धमकियों दे रहे थे। यह सिलसिला काफी देर से जारी था। आखिर तंग आ कर जब कम्पनी ने इसका खुलासा सुरक्षा बलों से किया तो नक्सली कारकुनों को पकड़ने के लिए  जाल बिछाया गया। गौरतलब है कि जिस पैसे को लोग या प्रशासन रंगदारी कहता है कम्युनिस्ट संगठनों में उसी पैसे को लेवी कहा जाता है। यह लेवी पार्टी स्वयं के कारकुनों और अन्य जानकारों से भी मांग सकती है। कम्युनिस्ट आंदोलनों के फंड की कमी इसी तरफ पूरी होती है।  
नक्सलियों को पकड़े जाने के घटनाक्रम पर हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक कार्तिक एस ने मीडिया को बताया कि पीएलआफआई के दोनों नक्सलियों को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी कर शनिवार की रात को धर दबोचा। उन्होंने इसका काफी और विस्तार भी दिया। उन्होंने बताया कि अपराधियों ने ओएनजीसी के अधिकारियों से रंगदारी मांगने की बात स्वीकारी है। दोनों की पहचान रोशनलाल राणा और सुनील कुमार के रूप में की गयी है। रोशन लाल के परिवार का पता लगाया गया तो पता चला कि वह गणेश राणा का बेटा है। इसी तरह सुनील कुमार संतो प्रसाद का बेटा है। 
कार्तिक ने बताया कि नक्सलवाद को काबू में करने के लिए हमारा अभियान तेज़ हैं और पिछले कुछ माह में माओवादियों के इस अलग हुए गिरोह पीएलएफआई के कुल 15 नक्सलियों को पुलिस ने हजारीबाग में गिरफ्तार करने में सफलता पायी है। जिनमें उनका जोनल कमांडर नंद किशोर महतो भी शामिल है। ज़ाहिर है कि यह करवाई नक्सली संगठनों पर काफी बड़ा आघात है। फिर भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि इन 15 
प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI) के नाम पर ओएनजीसी प्रभा कंपनी के डीजीएम अमित सिंह एवं अन्य लोगों से लेवी मांगने वाले दो अपराधियों को केरेडारी व बड़कागांव पुलिस ने गिरफ्तार किया है।  थाना प्रभारी ललित कुमार ने बड़कागांव थाना में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह जानकारी दी। 
उन्होंने बताया कि वरिष्ठ पदाधिकारियों को मिली गुप्त सूचना के आधार पर बड़कागांव थाना में दर्ज केस संख्या 79/20 के अप्राथमिक अभियुक्त रोशन लाल (पिता गणेश राणा) एवं सुनील कुमार (पिता संतो प्रसाद) को गिरफ्तार किया गया है। दोनों ग्राम पतरा खुर्द के निवासी हैं।  इन्हें पतरा खुर्द से ही गिरफ्तार किया गया है। 
थाना प्रभारी ने बताया कि गिरफ्तार किये गये अपराधियों ने स्वीकार किया है कि इन्होंने ओएनजीसी प्रभा कंपनी के डीजीएम अमित कुमार सिंह एवं अन्य लोगों से लेवी वसूली है। दोनों ने यह भी माना है कि उग्रवादी संगठन पीएलएफआइ के दिनेश गोप एवं अवधेश जायसवाल ने बड़कागांव के उरीमारी, पतरातू व भुरकुंडा क्षेत्र में नंद किशोर महतो को एरिया कमांडर बनाया है। 
ये दोनों उसी के निर्देश पर कंपनियों से लेवी की वसूली करते थे। थाना प्रभारी ने बताया कि दोनों अपराधियों से दो मोबाइल फोन बरामद हुए हैं। इसका कॉल डिटेल भी पुलिस के हाथ लगा है। छापामारी दल का नेतृत्व केरेडारी के थाना प्रभारी बम बम सिंह ने की। 
इनका सहयोग बड़कागांव थाना के पुलिस अवर निरीक्षक बबलू कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक दीपक कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक अभय कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक दिलीप कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक अमित कुमार, पुलिस अवर निरीक्षक उत्तम तिवारी एसआइटी हजारीबाग एवं सशत्र बल ने किया।  सुरक्षा बलों लिए बहुत बड़ी उपलब्धि भी है। 
इसी तरह पंजाब के गांव अचरवाल में इस बार भी 12 सितंबर को शहीद कामरेड अमर सिंह अचरवाल  की बरसी मनाई गई। वही कामरेड अमर सिंह अचरवाल एक ऐसा लोकप्रिय शख्स जिसका मानना था कि कभी भी स्कियोरिटी के लामलश्कर किसी को भी सुरक्षा नहीं दे सकते। व्यक्ति की नीतियां ही उसकी सुरक्षा करती हैं। कामरेड अचरवाल पंजाब की भूमि पर सक्रिय जन समर्थक योद्धाओं को एकजुट करने के प्रयासों में थे। उन्होंने बहुत  बदले लेकिन स्वर एक ही रहा। इसी बीच उनकी हत्या कर दी गयी। यह भी एक  लम्बी कहानी है जिसकी चर्चा फिर कभी सही। 
इस मौके पर कामरेड कंवलजीत सिंह खन्ना, कामरेड सुखदर्शन नत्त, कामरेड निर्भय ढुडीके, जसबीर नत्त, अवतार रसूलपुर, हरबंस कौर गौंसला, बी की यू (एकता-डकौंदा)नेता महिंद्र सिंह कमालपुरा इत्यादि कई सक्रिय नेताओं ने सम्बोधित किया। इस प्रकार इस तरह के आयोजन पंजाब में इस आंदोलन  फिर से तैयार कर रहे हैं।  लोग बहुत ही उत्साह और जोश के  साथ ऐसे आयोजनों में आते हैं।  
वास्तव में कामरेड अमर सिंह अचरवाल वाम नक्सली सियासत में एक ऐसा रणनीतिकार भी था जिसके सुझाव, और विचार  होने वाले फैसलों पर असर डालते थे। इसलिए कंर्फ्ड अचरवाल को पंजाब की सियासत से हटाने वाले लोग कौन होंगें शायद इसे समझना ज़रा भी मुश्किल न लगे चाहे उन हत्यारों के नाम और रूप कोई भी क्यूं न हों। एक ऐसा व्यक्ति हमसे छीन गया जिसे किसी सरकार की सुरक्षा पर नहीं बल्कि अपने लोगों की सुरक्षा पर भरोसा था। इस विश्वास को तोड़ने का प्रयास बहुत पहले भी होता रहा है। सरकारी सुरक्षा लेने की गुहार लगाने   खड़ा वह व्यक्ति आज भी अपने विचारों के ज़रिये इसी रहस्य को समझाने के लिए उत्सुक है। गोलिया चला कर उसका जिस्म तो दुनिया से हटा दिया गया लेकिन उसके विचार आज भी जगमगा रहे हैं। 

Tuesday, June 23, 2020

शहीद कामरेड निधान सिंह की क़ुरबानी को याद करते हुए

क्रूर यातना के बावजूद उन्होंने खालिस्तानी हत्यारों को कुछ न बताया 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 23 जून 2020 शाम 4:51 बजे: (नक्सलबाड़ी स्क्रीन  ब्यूरो) ::
आइये आज और 100 वीं जन्म शताब्दी वर्ष पर कॉमरेड निधान सिंह घुडाणी कलां की भावना का सम्मान करें और 29 वीं जन्म शताब्दी के वर्ष में.. खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ अपना जीवन दिया। लोगों की मुक्ति के लिए एक क्रूसेडर जब तक बहुत आखिरी और सबसे उत्साही प्रैक्टिशनर मासलाइन के। हमें हिंदुत्व फासीम के साथ उसकी धर्मनिरपेक्ष आत्मा को उसके क्रेसेंडो में कम करने की जरूरत है।

कामरेड निधान सिंह घुडाणी कलां को ठीक 29 साल पहले खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने फांसी पर लटका दिया था। कॉमरेड निधान के रूप में खालिस्तानी आतंक के खिलाफ कुछ साथियों ने ऐसे निरंतर प्रतिरोध किया, जिन्होंने उन्हें अपने सबसे कठिन बिंदु पर मारा। उस समय कुछ क्रांतिकारी वर्गों ने खालिस्तानी आतंकवाद या सिख कट्टरपंथी के साथ नरम पैडल किया। क्रूर यातना के अधीन होने के बावजूद उन्होंने अपने समूह के किसी भी रहस्य को बाहर करने के लिए समर्पित नहीं किया।

वह केंद्रीय टीम सी. पी. आई. (एम. एल.) समूह के थे जिसने खालिस्तानी कट्टरपंथी आंदोलन दांत और नाखून का मुकाबला किया या गहराई में किसी समूह ने नहीं किया। सन 1956 में उन्हें बपतिस्मा प्राप्त हुआ जब वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। अपने जीवनकाल में कई अवसरों पर उन्हें कैद किया गया था।  औपचारिक रूप से वह पंजाब किसान संघ के अध्यक्ष थे और उनके जीवन के अंत में रोपड़ में किसान संघर्ष समिति के नेता के रूप में काम कर रहे थे।

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन या मुक्ति के इतिहास में कॉमर्डे निधान सिंह का नाम स्थायी रूप से उत्कीर्ण होगा। वह उस युग के कामरेडों में से था जिसने खालिस्तानी अलगाववादी विचारधारा को मौत की भावना से परिभाषित किया था। बिना संदेह के वह हमारी भूमि के सबसे अच्छे पुत्रों में से एक था जिसकी आत्मा अभी भी चमकती है। दशकों तक किसान नेता के रूप में उन्होंने सावधानीपूर्वक काम किया। आज प्रचलित हिंदू भगवा आतंक का सामना करने के लिए निधान सिंह की तरह खिलने के लिए हमें और कमल चाहिए। निधान ने एक तकनीशियन के हुनर से एक सैनिक का निर्धारण किया। पंजाब में कुछ साथियों ने प्रेयरी फायर बनाने के लिए क्रांतिकारी प्रतिरोध की लाल चिंगारी दिखाई या चेयरमैन माओ की भावना को उतना ही निधान सिंह। उन्होंने अपने जीवनकाल में सबसे अधिक कष्टप्रद रास्तों को यात्रा की और इस प्रकार एक सच्चे क्रांतिकारी के आंतरिक, आध्यात्मिक सार को बाहर कर दिया। अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ के विचार में महारत हासिल की। उनका जीवन कामरेड के लिए अनुकरण करने के लिए एक उदाहरण था कि विभिन्न समयों पर एक आंदोलन की समस्याओं से कैसे निपटें और निराशा की गहराई से उठने के लिए।

बड़ी दृढ़ता और बोली कार्यप्रणाली के साथ उन्होंने बाएं साहसिक और एसएन सिंह के बाद दाएं विचलनवादी प्रवृत्ति का मुकाबला किया। सन 1970 के दशक में.. एक तलवार की धारणा के साथ उन्होंने सभी क्रांतिकारी हवाओं को अपनी रीढ़ की हड्डी में मारते हुए और अपनी आत्मा के मूल रूप में वैनगार्ड लेनिनिस्ट पार्टी के काटने के किनारे का बचाव किया। कॉमरेड निधान मास लाइन के अभ्यास में मास्टर थे। और सबसे अच्छे समर्थक या व्यवसायी सी. टी. सी. पी. आई. (एम. एल.) की लाइन के साथ उन्होंने सावधानीपूर्वक कौशल के साथ किसान संगठनों के भीतर एक अंश के रूप में काम किया, लेकिन अभी भी गुप्त पार्टी संगठन को संरक्षित कर रहे हैं।

8 जून को नक्सली शहीद तरसेम बावा की श्रद्धांजलि सभा में कामरेड कभी निधान के योगदान को नहीं भूल सकते। उस दिन 25 जून को उनके अनुयायियों ने  घुडाणी कलां में अपने गांव में एक सेना की तरह प्रतिरोध की चिंगारी प्रज्वलित की। यह समय बेहद नाज़ुक भी था तब 1991 में 5 जुलाई को उनकी स्मारक बैठक कई महिलाओं सहित, उत्साह में हजारों झुंड के साथ सबसे अधिक मार्मिक या प्रेरणादायक में से एक थी। मिलने का स्थान लाल चिरागों से जलने की याद दिलाता था। या एक चिंगारी प्रेयरी आग में बदल रही है। कॉम । स्मरण सभा में वक्ताओं ने खालिस्तानी आंदोलन और विचारधारा की फासीवादी प्रकृति पर बात की और यह राज्य के एजेंट के रूप में कैसे कार्य किया । उन्होंने कहा कि इस तरह की सभाएं सबसे अधिक उत्साहजनक थीं जिससे फासीवादी खालिस्तानी आंदोलन और राज्य आतंक का सामना करने के लिए पंजाब की जनता की उत्साह और क्षमता साबित हुई। सबसे उल्लेखनीय पत्रिका इंकलाबी जनतक लीह और अमोलक सिंह, सुर्ख रेखा के संपादक जसपाल जस्सी के भाषण थे। इस तरह की स्मारक बैठकों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बलों की एकता के लिए मार्ग प्रशस्त किया, विशेष रूप से मासलाइन प्रवृत्ति की।

2 गुप्त सशस्त्र संगठन, "शहीद करतारा सिंह ब्रिगेड" और "लाल गार्ड" ने उनकी मौत का बदला लिया था, जिन्होंने सशस्त्र टीम के साथ अपने हत्यारों को खत्म कर दिया था।

निधान के समय में सीसीआरआई और सीटी समूहों की एकता को पूरा नहीं किया गया था, लेकिन वह संगठन भोली केंद्रीय टीम जो निधान सिंह थे, बाएं साहसिक और सही अवसरवाद अपनी जड़ों पर लड़ी थी।

इस साल भी उनकी 100 वीं जयंती वर्ष है। आज कुछ माओवादी अभी भी सिख अतिवादी विचारधारा का समर्थन करते हुए कॉमरेड निधान सिंह को याद करते हुए हमें खालिस्तान आंदोलन की फासीवादी प्रकृति और अकाली आंदोलन की प्रतिक्रियावादी प्रकृति को याद रखना चाहिए। दुख की बात है कि उसका बेटा पत्रिका सुरख रेखा के संस्थापक नाज़र सिंह बोपराई भी इस प्रवृत्ति का शिकार हुआ है, जो मासलाइन के बीज बोये गए हैं। आज निधान सिंह के दर्दनाक योगदान के लिए भूमिहीन श्रम एवं किसान संगठनों में मासलाइन अभ्यास का बहुत बकाया है। पंजाब में मासलाइन क्रान्तिकारी आंदोलन में आज कई कमल खिलने के लिए बीज बोये। काश सुरख रेका में उनकी 10 वीं वर्षगांठ पर लिखे लेख का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा सकता और एक पुस्तिका में प्रकाशित किया जा सकता। विडंबना है कि सितंबर पत्रिका में 'सुरख रेखा' ने अपनी 40 वीं स्थापना वर्षगांठ मनाई है।  --Harsh Thakor
 


कामरेड जीता कौर के अधूरे काम पूरा करना ही होगी सच्ची श्रद्धांजलि

उसी तरह की और वीरांगनाएं भी ढूंढ़नी होंगीं 
लुधियाना: 23 जून 2020:(न्यूज़ मेकर//नक्सलबाड़ी स्क्रीन)::
ज़िंदगी यूं भी गुज़र सकती थी। बहुत ही पारम्परिक तरीके से। बालपन, लडकपन, इश्क विश्क, शादी ब्याह, बाल बच्चे और एक दिन शव यात्रा लेकिन जीता कौर को यह सब मंजूर नहीं था। उसके अंदर की आंख  वह सब भी देखने लगी जो आम लोगों को नजर न आता। बहुत से सवाल उसके मन में उठने लगे जो उसे चैन न लेने देते। इन सवालों का जवाब उसे न घर से मिलता, न ही स्कूल कालेज से और न ही समाज से। एक दिन उसके कालेज में एक सम्भ्रांत युवा महिला किसी बैठक विशेष का निमन्त्रण देने आई। उस बैठक और निमन्त्रण की जान पहचान उस युवा महिला ने बहु ही आकर्षक ढंग से कराई। वह युवा महिला पेशे से वकील थी। बहुत ही ध्यान से हर शब्द सुनती और बहुत ही सटीक जवाब देती। ऐसा जवाब जो हर धुंध और धुएं को तेज़ी से हटाता जा रहा था। जीता कौर को लगा कि इस बैठक में उसे अपने सवालों के जवाब ज़रूर मिलेंगे। इसी उम्मीद से बोली क्या मैं भी आ सकती हूं इस बैठक में? जवाब में मुस्कान भरी स्वीकृति मिली। यह बैठक थी जागृती महिला परिषद की और इस बैठक का निमन्त्रण लाने वाली युवा महिला थी सविता तिवाड़ी। यह संगठ सबंधित था लेकिन वास्तव में भाकपा(माले) लिबरेशन से जुड़ा हुआ था। न यूं तो इंडियन पीपुल्स फ्रंट 
इस बैठक में आए ही जीता कौर इसी संगठन से जुड़ गई। उसने अपने छोटे से जीवन के आरम्भिक दौर में ही देखा था कि किस तरह कांग्रेस से सबंधित कुछ नेताओं ने उसके पिता को सड़क हादसे में मरवाने की साज़िश रची। पिता रत्न सिंह बच तो गए लेकिन बहुत सी शरीरक समस्याएं पैदा हो गयीं। ज़िंदगी के इस दौर में जब बहुत से लोग मस्ती में मस्त रहे हैं तब जीता कौर देश की सियस और समाज के वास्तविक रंगों को न सिर्फ देख रही थी बल्कि अनुभव भी कर रही थी। उसके मन में उठते सवाल बढ़ते जा रहे थे। फिर प्रेम हुआ तो वह सपना भी साकार न हुआ। समाज ने इसकी स्वीकृति न दी। प्रेमी अपने परिवार से बात करने की हिम्मत तक न जुटा पाया। प्यार का यह सपना दिखा और बस दिखते ही टूट गया। इसके बाद जीता कौर ने किसी भी सा सांसारिक प्रेम का सपना न देखा। बस दिन रात एक ही धुन कि इस समाज को बदलना है। इस बदलाहट के लिए दिन रात काम करना है। निरंतर काम ही काम। उसे कैंसर हो गया लेकिन फिर भी आराम न किया। देहांत से कुछ ही दिन/सप्ताह पहले मानसा के कामरेड हरभगवान भीखी ने जीता कौर से एक औपचारिक मुलाकात की। मीडिआ के लिए कुछ सवाल पूछे। किसी को ऐसी आशंका तक न थी कि वह इतनी जल्दी हमसे बिछड़ जाएगी। हरभगवान भीखी की मुलाकात को आप पढ़ सकते हैं नक्सलबाड़ी (पंजाबी) में। अगर आपके पास उससे जुडी कोई याद हो तो वह भी हमें भेज सकते हैं। जिन लोगों ने समाज को बदलने के लिए अपना सारा जीवन दांव पर लगा दिया, हर सुख त्याग दिया उनकी ादों को संजोना और संभालना हम सभी का नैतिक कर्तव्य बनता है। हो सकता है आप जीता कौर के संगठन ा विचारों से सहमत न हों लेकिन ह तो आपको भी मानना ही लड़ेगा कि उसने अपनी ज़िंदगी समाज को बेहतर बनाने के मकसद को सामने रख कर लगाई। जीता कौर जैसी युवाओं को ढूंढ़ने में आज के पारम्परिक वाम दल बहुत कमज़ोर हैं। वे कुछ नहीं कर पा रहे। समाज में बदलाव चाहने वाले हर व्यक्ति को आगे आना होगा। खुद जागना होगा दूसरों को भी जगाना होगा। हमारे वक़्तों की वीरांगना कामरेड जीता कौर की चर्चा नक्सलबाड़ी स्क्रीन अंग्रेजी में भी है। आपके पास ऐसी कोई भी जानकारी हो तो हमें अवश्य भेजें। उन लोगों के विवरण संभालना हम सभी का कर्तव्य है जिन्होंने समाज को बदलने के लिए अपनी हर सांस तक लगा दी। कामरेड जीता कौर के संबंध में विवरण और तस्वीरें हमें भेजी कामरेड हरभगवान भीखी ने।  हम उनके आभारी हैं। --न्यूज़ मेकर